करीब तीन वर्षों तक देश की राजनीति, खेल जगत और मीडिया के केंद्र में रहे पूर्व भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) अध्यक्ष एवं पूर्व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह को आखिरकार दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत से बड़ी राहत मिल गई। महिला पहलवानों द्वारा दर्ज यौन उत्पीड़न मामले में अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। वैसे बृजभूषण शरण सिंह पर लगे आरोपों के समर्थन में जिस तरह तमाम विपक्षी नेता खड़े हो गये थे उसके चलते यह सब कुछ शुरू से ही राजनीतिक षड्यंत्र नजर आ रहा था। उल्लेखनीय है कि जंतर मंतर पर पहलवानों का धरना प्रदर्शन कराया गया था और धरने के मंच पर तमाम बड़े विपक्षी नेता पहुँचे थे और मंच से दिये गये भाषणों के जरिये भाजपा को महिला विरोधी बताया जा रहा था। साथ ही बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ देशभर में माहौल बनवाने और मीडिया ट्रायल के जरिये उनकी छवि बिगाड़ने के तमाम प्रयास किये गये थे। आरोप लगाने वाले पहलवानों ने अपने मेडल गंगा में बहाने तक की नौटंकी भी की थी ताकि जनता की सहानुभूति अर्जित की जा सके और हरियाणा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को जिताया जा सके। लेकिन साच का आंच नहीं वाली कहावत सही सिद्ध हुई और बृजभूषण सभी आरोपों से बाइज्जत बरी हो गये।
हम आपको बता दें कि दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत ने महिला पहलवानों द्वारा दर्ज यौन उत्पीड़न मामले में बृजभूषण शरण सिंह और तत्कालीन डब्ल्यूएफआई सहायक सचिव विनोद तोमर को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। इस फैसले ने न केवल तीन वर्षों से चल रहे कानूनी विवाद का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त किया है, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है।
उधर, फैसले के बाद बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि उन्हें शुरू से अपने ऊपर लगे आरोपों पर भरोसा नहीं था। उन्होंने कहा कि उनकी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि यदि आरोप सही साबित हुए तो वह स्वयं फांसी पर चढ़ जाएंगे, लेकिन आज का दिन उनके लिए प्रसन्नता का विषय है। वहीं, सरकारी पक्ष ने कहा है कि विस्तृत निर्णय मिलने के बाद उसका अध्ययन किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर उच्च अदालत में आगे की कानूनी कार्रवाई पर विचार किया जाएगा।
हम आपको याद दिला दें कि यह मामला अप्रैल 2023 में तब शुरू हुआ था, जब दिल्ली के कनॉट प्लेस थाने में छह महिला पहलवानों की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई थी। इसी दौरान एक नाबालिग की शिकायत पर पॉक्सो कानून के तहत भी अलग मामला दर्ज हुआ था। जून 2023 में दिल्ली पुलिस ने करीब 1500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी, जिसमें चार राज्यों के 22 गवाहों के बयान शामिल थे। बाद में नाबालिग शिकायतकर्ता और उसके पिता ने अपने आरोप वापस ले लिए थे। पुलिस ने अदालत से पॉक्सो मामला समाप्त करने का अनुरोध किया था जिसे मई 2025 में अदालत ने स्वीकार कर लिया था।
मई 2024 में अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत आरोप तय किए थे। मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल 32 गवाह पेश किए। बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि शिकायतकर्ताओं के बयानों में समय, स्थान और घटनाओं को लेकर कई बदलाव हुए तथा कुछ घटनाओं के समय आरोपी घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं थे। बचाव पक्ष ने शिकायत दर्ज कराने में सात-आठ वर्ष की देरी का मुद्दा भी उठाया।
दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष का कहना था कि पीड़िताओं के बयान मुकदमे के दौरान लगातार एक जैसे रहे और अन्य गवाहों ने भी उनका समर्थन किया। शिकायतकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने अदालत में तर्क दिया कि शक्ति के असंतुलन और खेल संघ के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति के प्रभाव के कारण शिकायत दर्ज कराने में देरी स्वाभाविक थी। हालांकि, अंततः अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को बरी कर दिया।
यूपी चुनाव पर क्या हो सकता है असर?
उधर, इस फैसले का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं माना जा रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला पहलवानों के आंदोलन और बृजभूषण शरण सिंह पर लगे आरोपों ने भाजपा को असहज स्थिति में ला दिया था। पार्टी को विपक्ष के लगातार हमलों का सामना करना पड़ा और अंततः कैसरगंज से बृजभूषण की जगह उनके पुत्र करण भूषण सिंह को चुनाव मैदान में उतारा गया था। अब अदालत से बरी होने के बाद भाजपा के लिए यह फैसला राजनीतिक दृष्टि से राहत देने वाला माना जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब अगले वर्ष उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं।
हम आपको बता दें कि बृजभूषण शरण सिंह का प्रभाव देवीपाटन मंडल और अवध क्षेत्र के कई जिलों में लंबे समय से माना जाता है। गोण्डा, बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती तथा आसपास के क्षेत्रों में उनकी मजबूत राजनीतिक पकड़, सामाजिक नेटवर्क और शैक्षणिक संस्थानों के माध्यम से व्यापक जनसंपर्क रहा है। ऐसे में उनके बरी होने के बाद इन क्षेत्रों में भाजपा की चुनावी संभावनाएं और मजबूत होने की चर्चा राजनीतिक हलकों में शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि उनके समर्थकों में नया उत्साह आएगा और इसका लाभ भाजपा उम्मीदवारों को मिल सकता है।
हालांकि, इस फैसले के बाद भाजपा नेतृत्व के सामने एक नई चुनौती भी उभर सकती है। माना जा रहा है कि अदालत के फैसले के बाद बृजभूषण शरण सिंह का राजनीतिक प्रभाव देवीपाटन मंडल और अवध क्षेत्र में और बढ़ेगा इसके चलते विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन में उनकी राय और पसंद को भी महत्व देना पड़ सकता है। स्थानीय राजनीति में उनका प्रभाव देखते हुए पार्टी के लिए संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर एक और पहलू पर भी है। हाल ही में उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान बृजभूषण शरण सिंह ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई थी क्योंकि उनके विधायक पुत्र प्रतीक भूषण सिंह को मंत्री नहीं बनाया गया था। अब अदालत से राहत मिलने के बाद यह अटकलें भी तेज हो सकती हैं कि भविष्य में संगठन या सरकार में उनके परिवार की राजनीतिक भूमिका और मजबूत हो। हालांकि, इस संबंध में भाजपा की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है।
बहरहाल, दिल्ली की अदालत का यह फैसला केवल एक चर्चित आपराधिक मुकदमे का निष्कर्ष नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीतिक तस्वीर का भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम बन गया है। जहां कानूनी मोर्चे पर बृजभूषण शरण सिंह को बड़ी राहत मिली है, वहीं इसके राजनीतिक प्रभावों पर अब सभी दलों की नजरें टिकी रहेंगी।
-नीरज कुमार दुबे