नौकरी के लिए इंटरव्यू में अब सिर्फ डिग्री या अनुभव काफी नहीं है। रेस्तरां में आपका व्यवहार और ड्रिंक ऑर्डर करने का तरीका भी चयन का पैमाना हो सकता है। करीब 2.38 लाख करोड़ रुपए के टर्नओवर वाली हेल्थकेयर कंपनी बूपा के सीईओ इनाकी एरेनियो 45 मिनट के पारंपरिक इंटरव्यू को काफी नहीं मानते। वे बड़े पदों के लिए तीन मुलाकातों में कुल छह घंटे का मूल्यांकन करते हैं। इसमें उम्मीदवार का आत्मविश्वास, पहल करने की क्षमता और दूसरों के प्रति सम्मान परखा जाता है। पहले चरण में दफ्तर में दो घंटे तक उम्मीदवार के सीवी और अनुभव पर विस्तार से चर्चा होती है। दूसरे चरण में रेस्तरां में नाश्ता या लंच किया जाता है। यहां एरेनियो देखते हैं कि उम्मीदवार खुद पहल करता है या दूसरों का अनुसरण करता है। यदि वे केवल पानी मंगाते हैं और उम्मीदवार अपने लिए वाइन ऑर्डर करता है, तो इससे वे उसका आत्मविश्वास और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता आंकते हैं। वे दूसरों की नकल करने वाले उम्मीदवारों को पसंद नहीं करते। एरेनियो ऐसे अकेले सीईओ नहीं हैं। करीब 2.95 लाख करोड़ की कंपनी ट्विलियो के सीईओ खोजेमा शिपचैंडलर वरिष्ठ उम्मीदवारों का 45 मिनट का डिनर इंटरव्यू लेते हैं। वे देखते हैं कि काम के बाद व्यक्ति कैसा व्यवहार करता है। बातचीत में बार-बार ‘मैं’ शब्द का इस्तेमाल टीम भावना की कमी का संकेत माना जाता है। वे उम्मीदवारों को सवाल पूछने के लिए 20 मिनट अलग से देते हैं। इस दौरान कोई सवाल न पूछना अयोग्यता माना जाता है। कुछ सीईओ ऐसे उम्मीदवारों को भी तुरंत खारिज कर देते हैं, जो खाना चखे बिना ही उसमें नमक डाल देते हैं। उनके अनुसार यह बिना सोचे-समझे फैसले करने की आदत दर्शाता है। वेटर से लेकर गार्ड तक से आपके व्यवहार पर गौर कर रहे कंपनियों के सीईओ एक सीईओ इंटरव्यू में वेटर से जानबूझकर गलत खाना सर्व करवाकर उम्मीदवार के गुस्से को परखा गया। एपल के स्टीव जॉब्स का मशहूर ‘बियर टेस्ट’ भी इसी सोच पर आधारित था। वे उम्मीदवार को दफ्तर से बाहर टहलाने ले जाते थे और देखते थे कि क्या उसके साथ सहज होकर समय बिताया जा सकता है। इससे वे समझते थे कि उम्मीदवार टीम में घुलने-मिलने और साथ काम करने के अनुकूल है या नहीं। ‘डायरी ऑफ अ सीईओ’ के फाउंडर स्टीवन बार्टलेट ने बिना अनुभव वाली एक महिला को सिर्फ इसलिए नौकरी दी क्योंकि उसने बिल्डिंग के गार्ड को नाम लेकर धन्यवाद कहा था।
नौकरी के लिए अब केवल डिग्री और अनुभव काफी नहीं:रेस्तरां में उम्मीदवार के व्यवहार, ड्रिंक ऑर्डर करने के तरीके से भी तय हो रही किस्मत
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सिद्धभूमि -
एक ऐसे समय में जब प्रिंट एवं मुद्रण अपनी प्रारंभिक अवस्था में था ,समाचार पत्र अपने संसाधनो के बूते निकाल पाना बेहद दुष्कर कार्य था ,लेकिन इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए स्वर्गीय श्री शयाम सुन्दर मिश्र “प्रान ” ने 12 मार्च 1978 को पडरौना (कुशीनगर ) उत्तर प्रदेश से सिद्ध भूमि हिंदी साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ किया | स्वर्गीय श्री शयाम सुन्दर मिश्र “प्रान ” सीमित साधनों व अभावों के बीच पत्रकारिता को मिशन के रूप में लेकर चलने वाले पत्रकार थे । उनका मानना था कि पत्रकारिता राष्ट्रीय लोक चेतना को उद्वीप्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है । इसके द्वारा ही जनपक्षीय सरोकारो को जिन्दा रखा जा सकता है । किसी भी संस्था के लिए चार दशक से अधिक का सफ़र कम नही है ,सिद्ध भूमि ने इस लम्बी यात्रा में जनपक्षीय सरोकारो को जिन्दा रखते हुए कर्मपथ पर अपने कदम बढ़ाएं हैं और भविष्य के लिए भी नयी आशाएं और उम्मीदें जगाई हैं । ऑनलाइन माध्यम की उपयोगिता को समझते हुए सिद्ध भूमि न्यूज़ पोर्टल की शुरुवात जुलाई 2013 में किया गया |
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