(अजय मसंद)
नागोया, 30 सितंबर भारतीय निशानेबाज नीरू धांडा की हथेली पर लिखे शब्द ‘अबकी बार गांठ बांध रखी है…102 फीसदी (स्वर्ण)’ खुद से किया गया वादा था जिसका मोटे तौर पर मतलब है ‘इस बार मैं पूरी तरह दृढ़ हूं’। और 27 साल की इस निशानेबाज ने इसे शानदार अंदाज में पूरा किया। उन्होंने एशियाई खेलों में लगातार दो स्वर्ण पदक जीतकर प्रतियोगिता में भारत की प्रमुख प्रदर्शन करने वाली खिलाड़ियों में अपनी जगह बनाई।
जब भी थकान, बीमारी और प्रतिकूल मौसम उनके अभियान को पटरी से उतारने का भय पैदा करते, हथेली पर लिखे हुए ये शब्द उन्हें अपना सर्वश्रेष्ठ देने और प्रक्रिया पर भरोसा रखने की याद दिलाते रहे। मंगलवार को महिलाओं की ट्रैप स्पर्धा में ऐतिहासिक जीत के बाद नीरू ने बुधवार को कायनन चेनाई के साथ मिलकर मिश्रित टीम का स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने मनीषा कीर और आशिमा अहलावत के साथ महिलाओं की टीम स्पर्धा का रजत भी जीता था।
लगातार होने वाली इन स्पर्धाओं ने शारीरिक रूप से असर डाला। एक दिन पहले व्यक्तिगत स्पर्धा के दौरान ठंड और लगातार बारिश में करीब तीन घंटे निशाना साधने के बाद नीरू जब मिश्रित टीम क्वालीफिकेशन के लिए रेंज पर लौटीं, तब भी थकान का असर दिख रहा था। लेकिन उन्होंने थकान को खुद पर हावी नहीं होने दिया।
नीरू ने कहा, ‘‘हम लगातार पांच या छह दिन निशानेबाजी करते हैं, इसलिए बार-बार उसी प्रक्रिया को दोहराने से शरीर और दिमाग धीरे-धीरे बेहतर होते जाते हैं। ’’
उन्होंने कहा, ‘‘आज भी वही चुनौती थी। मैं थकी हुई थी, लेकिन मुझे खुद को आगे बढ़ाना था और मैं लगातार आगे बढ़ती रही।
अहम यही था कि संयम रखा जाए और निशानों में चूक से उनकी लय नहीं बिगड़े। उन्होंने कहा, ‘‘निशाने लग भी रहे थे और चूक भी रहे थे। लेकिन मैं खुद को उससे प्रभावित नहीं होने दे रही थी।
मुझे खुद को मजबूत रखना था और प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करना था। मौसम शरीर को प्रभावित करता है। शरीर थक जाता है, और ऐसा हर किसी के साथ होता है।
कल बहुत ठंड थी, और मेरा शरीर अकड़ गया था। ’’
नीरू ने कहा, ‘‘मैं लगातार दो से तीन घंटे तक गीले कपड़े पहने हुए थी। सुबह मुझे अच्छा महसूस नहीं हो रहा था।
मेरे फिजियो अश्विनी ने हर राउंड से पहले मुझे उबरने में मदद की। मेरे साथियों में खासकर कायनन भैया ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। मैं थोड़ी कमजोर थी, लेकिन मैं उबरने में कामयाब रही।
