राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की प्रतिमा का अनावरण किया। यह प्रतिमा उस स्थान पर स्थापित की गई है जहां पहले ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा लगी थी। सरकार ने इसे औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। यह कार्यक्रम राजाजी उत्सव के अंतर्गत आयोजित हुआ, जिसमें उपराष्ट्रपति और कई केंद्रीय मंत्री उपस्थित रहे।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि राजाजी ने स्वतंत्रता के बाद अपने कक्ष में रामकृष्ण परमहंस और महात्मा गांधी के चित्र लगाए थे, जो मानसिक उपनिवेशवाद से मुक्ति का प्रतीक था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि राष्ट्रपति भवन में अब ब्रिटिश अधिकारियों के चित्रों के स्थान पर परम वीर चक्र विजेताओं के चित्र लगाए जा रहे हैं और परिसर को आम जनता के लिए अधिक खुला बनाया गया है। बाद में राष्ट्रपति कार्यालय ने एक बयान जारी कर कहा कि यह पहल औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को मिटाने और भारत की समृद्ध संस्कृति, विरासत, शाश्वत परंपराओं को गर्व से अपनाने तथा भारत माता की सेवा में असाधारण योगदान देने वालों को सम्मानित करने की दिशा में उठाए जा रहे कदमों की श्रृंखला का हिस्सा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस अवसर पर भेजे गए एक संदेश में कहा कि राजाजी और महात्मा गांधी के बीच गहरे आपसी विश्वास और मित्रता से चिह्नित घनिष्ठ संबंध थे जो सर्वविदित हैं।
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देखा जाये तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई अवसरों पर गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का आह्वान किया है। मोदी सरकार का तर्क है कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, मानसिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता भी आवश्यक है। सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा की इंडिया गेट के निकट स्थापना, राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का निर्माण, सेंट्रल विस्टा का पुनर्विकास, नए संसद भवन में सेंगोल की स्थापना और कई औपनिवेशिक नामों के परिवर्तन इसी क्रम में देखे जा रहे हैं।
राष्ट्रपति भवन में लुटियंस की प्रतिमा हटाकर राजाजी की स्थापना इसी वैचारिक धारा का विस्तार है। यह केवल एक प्रतिमा का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रतीकों की राजनीति के माध्यम से इतिहास की पुनर्व्याख्या है। संदेश स्पष्ट है कि सत्ता के केंद्र में अब औपनिवेशिक स्मृति नहीं, भारतीय चेतना का प्रतिनिधित्व होगा।
इस कदम की जहां देशभर में सराहना हो रही है वहीं ब्रिटेन के लेखक मैट रिडले ने खेद व्यक्त किया, क्योंकि लुटियंस उनके परदादा थे। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्हें दुख है कि उनके परदादा की प्रतिमा हटा दी गई। किंतु भारतीय संदर्भ में यह परिवर्तन एक व्यापक वैचारिक पुनर्स्थापन का संकेत देता है।
हम आपको बता दें कि राजगोपालाचारी, जिन्हें स्नेहपूर्वक राजाजी कहा जाता है, स्वतंत्र भारत के पहले और एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल थे। उन्होंने 1948 से 1950 तक इस पद पर कार्य किया। वह उसी भवन में रहे थे जिसे कभी वायसराय हाउस कहा जाता था और जो ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति का प्रतीक था। अब उसी भवन की भव्य सीढ़ियों के निकट उनकी प्रतिमा स्थापित होना इतिहास के एक चक्र के पूर्ण होने जैसा प्रतीत होता है।
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का जन्म 1878 में तमिलनाडु में हुआ था। वह पेशे से वकील थे, वह स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय सेनानी बने और महात्मा गांधी के निकट सहयोगी रहे। स्वतंत्रता के बाद वह भारत के गवर्नर जनरल बने। राजाजी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वह लेखक, विचारक और सामाजिक सुधारक भी थे। उन्होंने तमिल में रामायण और महाभारत की लोकप्रिय व्याख्याएं लिखीं। वह नैतिक राजनीति और सादगी के प्रतीक माने जाते थे।
हालांकि उनका राजनीतिक जीवन जटिलताओं से भरा रहा। 1937 में मद्रास प्रेसीडेंसी के प्रीमियर के रूप में उन्होंने स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य किया, जिसका तीव्र विरोध हुआ और द्रविड आंदोलन को बल मिला। बाद में वह हिंदी थोपने के विरोध में भी खड़े हुए। 1959 में उन्होंने स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की, जो आर्थिक स्वतंत्रता और मिनिमम गवर्नेंस की पक्षधर थी। 1967 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उस चुनाव ने राज्य की राजनीति में कांग्रेस वर्चस्व का अंत कर दिया। इस दृष्टि से वह तमिल राजनीति और राष्ट्रीय राजनीति के बीच सेतु के रूप में देखे जाते हैं।
जहां तक इस कदम को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से जोड़ कर देखे जाने की बात है तो आपको बता दें कि तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से द्रविड दलों के वर्चस्व में रही है। भाषा, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय अस्मिता वहां के प्रमुख मुद्दे हैं। भारतीय जनता पार्टी को वहां अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। ऐसे में राजाजी की प्रतिमा की स्थापना का समय महत्वपूर्ण है। आगामी तमिलनाडु विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह कदम प्रतीकात्मक राजनीति का हिस्सा माना जा सकता है। राजाजी एक ऐसे तमिल नेता थे जो राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिष्ठित रहे। वह द्रविड दलों से जुड़े नहीं थे, परंतु तमिल समाज में उनका सम्मान है।
नए संसद भवन में सेंगोल की स्थापना और काशी तमिल संगमम जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से केंद्र सरकार ने तमिल सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने का प्रयास किया है। राजाजी की प्रतिमा उसी कड़ी का अगला कदम प्रतीत होती है। यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि तमिल परंपरा और राष्ट्रीयता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। इससे भाजपा को यह कहने का अवसर मिलेगा कि वह तमिल गौरव को राष्ट्रीय सम्मान दे रही है।
देखा जाये तो मोदी सरकार यह स्थापित करना चाहती है कि स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी यदि औपनिवेशिक प्रतीक सत्ता के केंद्र में बने रहें तो मानसिक स्वतंत्रता अधूरी है। इस दृष्टि से यह कदम गुलामी की मानसिकता को ध्वस्त करने के अभियान का हिस्सा है। हालांकि आलोचक इसे चुनावी राजनीति से जोड़कर देख सकते हैं, परंतु यह भी सच है कि राष्ट्र निर्माण में प्रतीकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यदि सार्वजनिक स्थलों पर भारतीय नायकों को प्रमुखता दी जाती है तो वह आत्मविश्वास को मजबूत करता है।
तमिलनाडु के संदर्भ में यह कदम भाजपा को वैचारिक और भावनात्मक आधार प्रदान कर सकता है। जिस भवन में गवर्नर जनरल के रूप में राजाजी रहे, उसी भवन में वह प्रतिमा के रूप में लौटे हैं तो क्या इससे चुनावी परिणाम बदलेंगे, यह तो भविष्य बताएगा, परंतु इतना निश्चित है कि राजाजी की प्रतिमा ने इतिहास, राजनीति और पहचान की बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है।
बहरहाल, राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियों पर स्थापित यह प्रतिमा केवल धातु की आकृति नहीं, बल्कि उस विचार का प्रतीक है जो कहता है कि भारत अब अपने अतीत को स्वयं परिभाषित करेगा और गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर विकसित भारत की ओर अग्रसर होगा।
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
