वेलेंटाइन वीक में जहां दुनिया भर के युगल प्रेम और रोमांस में डूबे नजर आ रहे हैं, वहीं चीन के कई युवक युवतियां विवाह और रिश्तों से दूरी बनाते दिख रहे हैं। साथ ही चीनी नव वर्ष लुनार के आगमन से ठीक पहले चीन के शीर्ष इंटरनेट नियामक ने सोशल मीडिया मंचों पर ऐसी सामग्रियों के खिलाफ सख्त अभियान छेड़ने की घोषणा की है जो विवाह और संतान जन्म को लेकर डर, हिचक या उदासी फैलाती हैं। नियामक का कहना है कि उत्सव काल में ऐसा माहौल बनाया जाना चाहिए जो हर्ष, शांति और सकारात्मकता से भरा हो, इसलिए एक माह तक विशेष निगरानी अभियान चलाया जाएगा।
नियामक ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट किया है कि लिंग आधार पर टकराव भड़काने वाली बातें, विवाह से दूरी को बढ़ावा देने वाले संदेश, तथा संतान जन्म को बोझ बताने वाली सामग्री हटाई जाएंगी। बयान में कहा गया है कि ऐसी सामग्री समाज में नकारात्मक भाव जगाती है और युवाओं को परिवार बसाने से विमुख करती है। प्रमुख सोशल मीडिया मंचों से कहा गया है कि वह अलग दल बनाकर चौबीसों घंटे निगरानी रखें तथा खोज शब्दों, सुझाव प्रणाली और टिप्पणियों पर खास ध्यान दें।
इस अभियान का एक पहलू एआई से बनी सामग्री भी है। नियामक का कहना है कि बहुत-सी सामग्रियां ऐसी बन रही हैं जो परिवार के भीतर झगड़ा, सास बहू तनातनी, माता पिता का पक्षपात या भाई बहन के विवाद को बढ़ा चढ़ा कर दिखाती हैं ताकि अधिक लोग आकर्षित हों। ऐसी सामग्री को भी हटाने का निर्देश दिया गया है, खासकर जब वह तर्कहीन हों या केवल सनसनी फैलाने के लिए गढ़ी गई हों।
धन का दिखावा करने वाले दृश्य, अश्लील या हिंसक चित्र, तथा इशारा भरी भाषा भी इस अभियान के दायरे में है। जिन मंचों पर ऐसी सामग्री बार बार पाई जाएगी उनके विरुद्ध जांच और दंड की बात कही गई है, हालांकि दंड का स्वरूप सार्वजनिक नहीं किया गया है।
हम आपको बता दें कि यह कदम उस समय उठाया गया है जब चीन में जन्मदर लगातार गिर रही है। हाल के आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या लगभग 89 लाख रही, जो पिछले वर्ष की तुलना में 17 प्रतिशत कम है। कुल प्रजनन दर 1 के आसपास बताई जा रही है, जबकि जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए यह दर 2 से अधिक मानी जाती है। जनसंख्या बढ़ाने के लिए चीन की सरकार पहले से ही अनेक प्रोत्साहन दे रही है। नव विवाहित युगलों को कर में राहत, घर खरीद में सहारा, मातृत्व अवकाश का विस्तार, छोटे बच्चों वाले परिवारों को वार्षिक अनुदान, विवाह पंजीकरण की सरल प्रक्रिया और सार्वजनिक बाल शिक्षा केंद्रों का विस्तार जैसे कदम उठाए गए हैं। राज्य परिषद से जुड़े अध्ययन समूहों ने भी माना है कि विवाह की बढ़ती आयु, संतान इच्छा में कमी, जनन आयु की महिलाओं की घटती संख्या और बांझपन में वृद्धि जैसे कारण जन्मदर को लंबे समय तक नीचे रख सकते हैं। ऐसे माहौल में यह अभियान जनमत को दिशा देने का नया प्रयास माना जा रहा है।
चीन का यह कदम जनसंख्या संकट से जूझ रहे एक देश की चिंता का आईना है। जब कोई सरकार विवाह और संतान जैसे निजी निर्णयों से जुड़ी चर्चा को नियंत्रित करने लगे तो समझना चाहिए कि समस्या कितनी गहरी है। जन्मदर का गिरना केवल अंक नहीं, आने वाले दशकों की अर्थ व्यवस्था, श्रम शक्ति, बुजुर्ग देखभाल और सामाजिक संतुलन का प्रश्न है।
फिर भी सवाल उठता है कि क्या विचारों पर पहरा लगाकर पालना घर भर सकते हैं। युवा पीढ़ी विवाह और संतान से इसलिए दूर नहीं जा रही कि उसने केवल कुछ नकारात्मक कहानियां देख लीं। शहरों में महंगी आवास व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च, कार्यस्थल का दबाव, तथा निजी जीवन की आकांक्षाएं वास्तविक कारण हैं। जब तक इन जड़ कारणों पर ठोस सुधार नहीं होगा, केवल संदेशों की छंटाई से मन नहीं बदलेंगे।
दूसरा पहलू अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का है। समाज में विवाह को लेकर डर, मातृत्व को लेकर चिंता या परिवार के भीतर के टकराव भी वास्तविक अनुभव हैं। यदि इन पर खुली चर्चा न हो तो समाधान भी दब जाता है। हर आलोचना को नकारात्मक कह देना आसान है, पर इससे नीति निर्माण के लिए जरूरी सच सामने नहीं आता। स्वस्थ समाज वह है जहां लोग अपने सुख दुख खुलकर कह सकें और सरकार उन संकेतों से सीख ले।
एआई से बनी सनसनीखेज सामग्री पर लगाम लगाना समझ में आता है, क्योंकि वह झूठ और अतिशयोक्ति से माहौल बिगाड़ सकती है। पर सीमा रेखा कहां खींची जाएगी, यह अहम है। यदि हर असहमति को हानिकारक बताकर हटाया गया तो भरोसा कम होगा। भरोसा किसी भी जनसंख्या नीति की असली पूंजी है।
चीन ने आर्थिक प्रोत्साहन, अवकाश, अनुदान और सुविधा के रास्ते भी अपनाए हैं, जो स्वागत योग्य हैं। अनुभव बताता है कि जहां बाल देखभाल सुलभ हो, काम और जीवन में संतुलन हो, और महिलाओं को समान अवसर मिले, वहां परिवार बसाने का निर्णय सहज होता है। सम्मान, सुरक्षा और स्थिरता का भाव किसी भी प्रचार से अधिक असरदार होता है।
बहरहाल, यह समझना होगा कि विवाह और संतान केवल सरकार की योजना नहीं, लोगों का निजी जीवन है। सरकार सहायक बन सकती है, संचालक नहीं। यदि नीति लोगों के जीवन को सरल बनाती है तो वे स्वयं भविष्य चुनते हैं। यदि केवल डर और नियंत्रण दिखे तो उलटा असर भी हो सकता है। चीन का यह अभियान दुनिया के लिए भी संकेत है कि जनसंख्या का प्रश्न अब केवल संख्या का नहीं, विश्वास और जीवन गुणवत्ता का भी है।
-नीरज कुमार दुबे