अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध के बीच हालात और गंभीर हो गये हैं। अमेरिका के बी-वन लांसर बमवर्षक विमान ब्रिटेन के ग्लॉस्टरशायर स्थित फेयरफोर्ड वायुसेना अड्डे पर उतर चुके हैं, जहां से ईरान की राजधानी तेहरान समेत उसके सैन्य ठिकानों पर हमले की तैयारी की जा रही है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर द्वारा अमेरिकी सेना को अपने सैन्य अड्डों के उपयोग की अनुमति देने के बाद इस तैनाती को संघर्ष में एक बड़े सैन्य कदम के रूप में देखा जा रहा है।
उधर, पश्चिम एशिया में इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष दूसरे सप्ताह में प्रवेश करते ही और अधिक तीव्र हो गया है। क्षेत्र के कई देशों में सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं, जबकि हवाई हमलों, समुद्री हमलों और मिसाइल अभियानों के कारण पूरे इलाके में अस्थिरता बढ़ती जा रही है। इस बीच नागरिकों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय यातायात और समुद्री व्यापार भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है।
इजराइल की सेना ने घोषणा की है कि उसने ईरान की राजधानी तेहरान और इस्फहान सहित मध्य ईरान में कई सैन्य ठिकानों पर व्यापक हवाई हमले किये हैं। सेना के अनुसार अस्सी से अधिक लड़ाकू विमानों ने ईरान के सैन्य ढांचे, मिसाइल प्रक्षेपण स्थलों और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया। ईरान के इस्फहान प्रांत के एक अधिकारी ने बताया कि इन हमलों में कम से कम आठ नागरिकों की मृत्यु हो गयी, जिनमें एक महिला भी शामिल है, जबकि लगभग अस्सी मकान बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गये।
दूसरी ओर, इजराइल ने समानांतर रूप से लेबनान में भी अपने अभियान को तेज किया है। इजराइली सेना ने कहा कि उसने दक्षिणी और पूर्वी लेबनान में हिजबुल्ला के ठिकानों को निशाना बनाया। पूर्वी बेका घाटी में हुए हवाई हमलों में कम से कम 16 लोगों की मृत्यु और पैंतीस लोग घायल होने की सूचना है। हिजबुल्ला ने दावा किया कि उसके लड़ाकों की इजराइली बलों के साथ झड़प हुई, हालांकि इजराइल ने इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।
विश्लेषकों के अनुसार ईरान ने पिछले कई दशकों में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए एक तथाकथित प्रतिरोध धुरी विकसित की थी, जिसमें हिजबुल्ला, हमास और क्षेत्र के अन्य सशस्त्र समूह शामिल रहे। माना जा रहा है कि इजराइल और अमेरिका के लगातार हमलों ने इस नेटवर्क की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
उधर अमेरिका ने भी अपने सैन्य कदम तेज कर दिये हैं। 146 फुट लंबा बी-वन लांसर बमवर्षक विमान ब्रिटेन के ग्लॉस्टरशायर स्थित वायुसेना अड्डे फेयरफोर्ड पहुंच गया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने ईरान के मिसाइल ठिकानों के खिलाफ अमेरिका को अपने सैन्य अड्डों के उपयोग की अनुमति दे दी है। हालांकि इस निर्णय से पहले अनुमति देने में हुई देरी को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ब्रिटेन के कुछ नेताओं ने स्टारमर की आलोचना की थी। स्टारमर ने अपनी सफाई में कहा कि बिना स्पष्ट योजना के किसी युद्ध में शामिल होना अवैध भी हो सकता है।
इस बीच, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने अपने देश के आत्मसमर्पण की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि ईरानी जनता के आत्मसमर्पण की इच्छा रखने वालों को अपनी यह इच्छा कब्र तक ले जानी होगी। हालांकि उन्होंने पड़ोसी देशों से माफी भी मांगी और कहा कि ईरान की सैन्य कार्रवाइयों से प्रभावित देशों से वह खेद व्यक्त करते हैं।
उधर, तनाव के बीच समुद्री क्षेत्र भी प्रभावित हुआ है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने दावा किया कि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य में प्राइमा नाम के एक तेल टैंकर को विस्फोटक ड्रोन से निशाना बनाया। ईरान के अनुसार जहाज ने समुद्री आवाजाही पर लगाई गयी चेतावनियों की अनदेखी की थी, जिसके बाद यह कार्रवाई की गयी।
संघर्ष का असर नागरिक उड्डयन पर भी पड़ा है। दुबई का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, जिसे अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए दुनिया के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में माना जाता है, हाल के हमलों के कारण कुछ समय के लिए बंद करना पड़ा। बाद में आंशिक रूप से उड़ानें फिर शुरू की गयीं, लेकिन यात्रियों को केवल पुष्टि होने पर ही हवाई अड्डे पहुंचने की सलाह दी गयी है। कई उड़ानों के समय में लगातार बदलाव किया जा रहा है और अमीरात विमानन सेवा ने भी दुबई से आने जाने वाली सभी उड़ानों को अगले आदेश तक रोक दिया है।
इधर, इजराइल में फंसे अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी कदम उठाये गये हैं। यरुशलम स्थित अमेरिकी दूतावास ने नागरिकों को इजराइल से बाहर निकालने के लिए बस सेवा शुरू की है। यह बसें लोगों को मिस्र के ताबा शहर तक ले जाएंगी, जहां से वे आगे की यात्रा कर सकेंगे।
इस बीच, भारतीय दृष्टिकोण से भी यह संकट महत्वपूर्ण बन गया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रायसीना संवाद में बताया कि हिंद महासागर में अमेरिकी हमले से प्रभावित एक ईरानी जहाज को मानवीय आधार पर कोच्चि बंदरगाह में प्रवेश की अनुमति दी गयी थी। उन्होंने कहा कि जहाज पहले एक नौसैनिक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए निकला था, लेकिन क्षेत्र में तेजी से बदलते हालात के कारण वह घटनाओं के गलत पक्ष में फंस गया। भारत ने इस मामले में अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय दृष्टिकोण दोनों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया।
बहरहाल, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष इसी प्रकार बढ़ता रहा तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल पूरे क्षेत्र में तनाव चरम पर है और दुनिया की निगाहें आगे की घटनाओं पर टिकी हुई हैं।