अतीत में ईरान काफी बड़ा और ताकतवर देश रहा है। ईरान की सीमा वक्त के साथ-साथ घटती बढ़ती रही। खासतौर पर अगर आज के ईरान और प्राचीन ईरान की बात करें तो सिकंदर से लेकर तुर्क और अरब देशों के आक्रमणकारियों ने ईरान को अपना निशाना बनाया। बताया जाता है कि सातवीं शताब्दी में अरब के खलीफाओं ने जब अपनी सीमाओं का विस्तार किया तो उन्होंने ईरान के आसपास के देशों पर कब्जा करने के साथ ही ईरान को भी अपने कंट्रोल में ले लिया था। आठवीं सदी तक पारसी बहुसंख्यक देश ईरान में इस्लामी कानूनों को सख्ती से लागू किया जाने लगा। बड़े पैमाने पर यहां धर्मांतरण हुआ। इस्लामी हुकूमत आने के बाद लाखों पारसी पूरब की तरफ पलायन करने लगे। उनमें से कुछ पारसी भारत आकर बस गए।
इसे भी पढ़ें: History of Iran Chapter 1 | मेसेडोनिया का सिकंदर कैसे बना पर्शिया का सुल्तान |Teh Tak
ईरान में शिया या सुन्नी क्या ज्यादा हैं
ईरान एक इस्लामिक देश है.यहां की लगभग 99 प्रतिशत आबादी इस्लाम धर्म को मानती है। हालांकि, इस्लाम के भीतर भी अलग-अलग धाराएं और संप्रदाय होते हैं। ईरान में रहने वाले मुसलमानों में से करीब 90 से 95 प्रतिशत लोग शिया मुस्लिम हैं, जबकि 5 से 10 प्रतिशत लोग सुन्नी मुस्लिम हैं। इसी वजह से ईरान को दुनिया का सबसे बड़ा शिया बहुल देश माना जाता है। इसके अलावा ईरान में बहुत कम संख्या में यहूदी, ईसाई, पारसी और बहाई समुदाय के लोग भी रहते हैं। बहाई धर्म को ईरान में आधिकारिक मान्यता नहीं मिली हुई है।
शिया सुन्नी होते कौन हैं-
सुन्नी- सुन्नत का मतलब उस तौर तरीक़े को अपनाना है जिस पर पैग़म्बर मोहम्मद (570-632 ईसवी) ने ख़ुद अमल किया हो और इसी हिसाब से वे सुन्नी कहलाते हैं। दुनिया के लगभग 80-85 प्रतिशत मुसलमान सुन्नी हैं जबकि 15 से 20 प्रतिशत के बीच शिया हैं।
शिया- शिया मुसलमानों की धार्मिक आस्था और इस्लामिक क़ानून सुन्नियों से काफ़ी अलग हैं। वह पैग़म्बर मोहम्मद के बाद ख़लीफ़ा नहीं बल्कि इमाम नियुक्त किए जाने के समर्थक हैं। उनका मानना है कि पैग़म्बर मोहम्मद की मौत के बाद उनके असल उत्तारधिकारी उनके दामाद हज़रत अली थे।
इन दोनो पंथों का बंटवारा पैगंबर मोहम्मद के निधन के बाद हुआ। मोहम्मद साहब के बाद उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? इसको लेकर दोनों पंथों में मतभेद हैं। जिस शरिया कानून पर इस्लाम चलता है वो भी इन दोनों पंथों में कुछ मुद्दों में अलग-अलग है। पैगंबर मोहम्मद का जन्म 570ईं के आसपास माना जाता है। उनकी मृत्यु 632 ई के आसपास की मानी जाती है। 40 साल की उम्र में उन्हें अल्लाह का आखिरी दूत घोषित किया गया।
अज़ान से लेकर नमाज़ तक के तौर तरीके अलग अलग
सुन्नी समुदाय ने हज़रत अबु बक्र के बाद हज़रत उमर, हज़रत उमर के बाद हज़रत उस्मान और हज़रत उस्मान के बाद हज़रत अली को अपना खलीफा चुना। जबकि शिया मुसलमानों ने खलीफा के बजाय हज़रत अली को अपना इमाम माना और हज़रत अली के बाद ग्याहर अन्य इमामों को मोहम्मद साहब का उत्तराधिकारी माना। खलीफा और इमाम का अर्थ लगभग एक जैसा ही है, इन दोनों का ही अर्थ उत्ताराधिकारी का है। यानी दोनों ही समुदायों के बीच असल लड़ाई मोहम्मद साहब के उत्तराधिकारी के पद को लेकर है। हालांकि दोनों ही समुदायों में काफी सारी भिन्नताएं हैं जो दोनों को ही एक दूसरे से अलग करती है। इन दोनों समुदाय के लोगों की अज़ान से लेकर नमाज़ तक के तौर तरीके अलग अलग हैं।
क्यों दो धड़ों में बंट गए मुसलमान
पैगंबर मोहम्मद साहब अपने शहर पहुंचे और कुछ ही महीनों के बाद उनका निधन हो गया। मोहम्मद साहब के निधन के बाद मोहम्मद साहब की गद्दी पर उनका कौन वारिस बैठेगा इसी को लेकर दोनों ही समुदाय अलग-थलग पड़ गए। एक पक्ष का मानना था कि मोहम्मद साहब ने किसी को अपना वारिस नहीं बनाया है। इसलिए योग्य शख्स को चुना जाए। दूसरे पक्ष का मानना था कि पैगंबर मोहम्मद ने गदीर के मैदान में जो घोषणा की थी वो वारिस को लेकर ही थी। एक धड़े ने पैगंबर मोहम्मद के ससुर अबु बक्र को अपना नेता माना। जबकि दूसरे धड़े ने पैगंबर मोहम्मद के दामाद हजरत अली को अपना नेता माना। पैगंबर मोहम्मद के कथनों और कार्यों यानी सुन्ना में विश्वास रखने वाले सुन्नी कहलाए। हजरत अली को पैगंबर मोहम्मद का वारिस मानने वाले शियाने अली यानी शिया कहलाए।
ईरान में शिया क्यों ज्यादा हैं?
ईरान में शिया इस्लाम की जड़ें बहुत गहरी हैं। यहां मुख्य रूप से बारह इमामों को मानने वाला शिया संप्रदाय को देश का राजकीय धर्म माना जाता है। शिया मुसलमानों का मानना है कि पैगंबर मोहम्मद के बाद नेतृत्व उनके परिवार के लोगों को मिलना चाहिए था। शिया बारह इमामों में विश्वास रखते हैं। बारहवें इमाम, इमाम महदी, एक दिन वापस लौटेंगे और न्याय स्थापित करेंगे। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में शिया धर्मगुरुओं की ताकत बहुत बढ़ गई। आज धर्मगुरु राजनीति में बड़ा रोल निभाते हैं, सुप्रीम लीडर सबसे ताकतवर पद होता है, धार्मिक विद्वानों की बात को सामाजिक और कानूनी मामलों में अंतिम माना जाता है। ईरान की सरकार और कानून व्यवस्था पर शिया इस्लाम का सीधा असर दिखाई देता है।
