बड़ी बड़ी डींगे हांकने वाले और खोखले भाषणों से मुल्क को बहलाने वाले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने आखिरकार वह सच कबूल कर लिया है जिसे दुनिया पहले से जानती थी। इस्लामाबाद में उद्योगपतियों के सामने शहबाज शरीफ ने स्वीकार किया कि वह विदेश दौरों पर जाकर पैसे की भीख मांगते हैं और इस दौरान उनका सिर शर्म से झुक जाता है। यह स्वीकारोक्ति ऐसे समय आई है जब एक हालिया अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में यह दावा किया गया था कि दुनिया भर में सबसे अधिक भिखारी पाकिस्तानी मूल के पाए जाते हैं।
इस्लामाबाद में आयोजित उद्योगपतियों और निर्यातकों के सम्मेलन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने जो कहा, उसने पूरे देश की सच्चाई को नंगा करके रख दिया है। वर्षों से खोखले नारों में जी रहे पाकिस्तान ने खुले मंच से यह स्वीकार किया है कि उसकी सत्ता और अर्थव्यवस्था कर्ज की भीख पर टिकी है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने स्वीकार किया है कि विदेशी कर्ज मांगना न केवल मजबूरी है बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान को रौंदने वाला अपमान भी है।
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शहबाज शरीफ ने साफ शब्दों में कहा कि जब वह और सेना प्रमुख असीम मुनीर दुनिया भर में धन मांगने जाते हैं तो उनका सिर शर्म से झुक जाता है। शहबाज शरीफ का कथन इस बात का प्रमाण है कि पाकिस्तान दानदाताओं की शर्तों पर चलने वाला एक निरीह तंत्र बन चुका है। प्रधानमंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि कर्ज के बदले उन मांगों को मानना पड़ता है जिनका कोई औचित्य नहीं होता। हम आपको बता दें कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था आज पूरी तरह बाहरी सहारे पर खड़ी है। चीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर से मिलने वाली आर्थिक बैसाखियों के बिना इस्लामाबाद की सत्ता एक दिन भी खड़ी नहीं रह सकती। चीन ने पाकिस्तान को अरबों की राशि दी है और चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के नाम पर भारी निवेश पहले ही पाकिस्तान को कर्ज के जाल में जकड़ चुका है। सऊदी अरब और अमीरात तेल भुगतान में राहत और जमा राशि के सहारे पाकिस्तान को सांस लेने का मौका दे रहे हैं, जबकि कतर ऊर्जा आपूर्ति के जरिए उसे डूबने से बचा रहा है।
इन तथ्यों के बीच सबसे भयावह सच यह है कि पाकिस्तान पर सार्वजनिक कर्ज अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुका है। कुछ ही वर्षों में यह राशि लगभग दोगुनी हो चुकी है। देश बार-बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दरवाजे पर कटोरा लेकर पहुंचता है और हर बार कठोर शर्तें स्वीकार करता है। सब्सिडी कटौती, कर वृद्धि और सामाजिक खर्च में कटौती का बोझ सीधे आम जनता पर डाला जाता है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने गरीबी और बेरोजगारी पर चिंता जताई, लेकिन यह चिंता खोखली प्रतीत होती है। देश की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे धकेली जा चुकी है। युवा बेरोजगार हैं, पढ़े लिखे लोग दर दर भटक रहे हैं और अनौपचारिक क्षेत्र में शोषण चरम पर है। निर्यात आज भी कपड़ा और कच्चे माल तक सीमित है, जबकि नवाचार और अनुसंधान के नाम पर पाकिस्तान का डब्बा गोल है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे खतरनाक संकेत यह है कि कर्ज वार्ताओं में सेना प्रमुख की सक्रिय भूमिका। यह संदेश साफ है कि पाकिस्तान में नागरिक शासन महज दिखावा है और वास्तविक सत्ता सैन्य नेतृत्व के हाथ में है। कर्जदाताओं को भरोसा दिलाया जाता है कि भुगतान की गारंटी बंदूक के दम पर दी जाएगी।
देखा जाये तो पाकिस्तान आज जिस स्थिति में है, वह किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं बल्कि वर्षों की गलत नीतियों, सैन्य वर्चस्व और सत्ता के लालच की देन है। शहबाज शरीफ की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति दरअसल एक फिसलती हुई व्यवस्था की चीख है। जब कोई प्रधानमंत्री यह कहे कि वह दुनिया में घूम घूम कर पैसा मांग रहा है, तो समझ लेना चाहिए कि राष्ट्र की रीढ़ टूट चुकी है। सामरिक दृष्टि से यह स्थिति अत्यंत गंभीर है। जो देश अपनी अर्थव्यवस्था नहीं संभाल सकता, वह अपनी सीमाएं, अपनी संप्रभुता और अपने फैसले भी सुरक्षित नहीं रख सकता। पाकिस्तान की विदेश नीति अब स्वतंत्र नहीं रही। चीन, खाड़ी देशों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तें ही उसका दिशा सूचक बन चुकी हैं। यह वही पाकिस्तान है जो कभी अपने भूगोल को किराये पर देकर धन कमाने का दावा करता था। आज वही भूगोल बोझ बन चुका है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जहां जनता महंगाई और ऊर्जा संकट से जूझ रही है, वहीं सत्ता प्रतिष्ठान वैश्विक मंचों पर छवि सुधार और प्रभाव बनाने में धन उड़ाता है। कथित शांति मंचों और विदेशी लॉबी पर खर्च किया गया पैसा इस बात का प्रमाण है कि प्राथमिकताएं पूरी तरह विकृत हैं। शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर इस पतन के दो चेहरे हैं। एक लोकतंत्र का मुखौटा, दूसरा सैन्य प्रभुत्व का प्रतीक। दोनों ने मिलकर पाकिस्तान को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां आत्मनिर्भरता का सपना मजाक बन चुका है। जब तक सत्ता संरचना नहीं बदलेगी, कर सुधार नहीं होंगे और सैन्य हस्तक्षेप समाप्त नहीं होगा, तब तक हर नया कर्ज पिछले कर्ज की कब्र पर डाली गई एक और मिट्टी होगा।
बहरहाल, आज पाकिस्तान एक भिखारी राष्ट्र की तरह खड़ा है। कटोरा हाथ में है, नजरें दूसरों की जेब पर टिकी हैं और आत्मसम्मान इतिहास की किताबों में कैद हो चुका है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक और नैतिक दिवालियापन की घोषणा है।
