कांग्रेस नेता राहुल गांधी भले ही मोदी सरकार की विदेश नीति को विफल साबित करने के लिए लगातार बयानबाजी कर रहे हों, लेकिन उनकी ही पार्टी के अनुभवी और कूटनीति समझने वाले दिग्गज नेता अब खुलकर इस नैरेटिव को ध्वस्त करते नजर आ रहे हैं। वह न केवल मोदी सरकार की रणनीति और संतुलित कूटनीति की सराहना कर रहे हैं, बल्कि यह भी संकेत दे रहे हैं कि जमीनी सच्चाई कुछ और ही है। यह महज साधारण मतभेद नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर गहराती वैचारिक दरार का खुला प्रमाण है, जहां एक तरफ राहुल गांधी राजनीतिक एजेंडा साधने में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर सत्ता और वैश्विक कूटनीति का अनुभव रखने वाले नेता राष्ट्रहित को प्राथमिकता देते हुए सच के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।
हम आपको बता दें कि पूर्व विदेश मंत्री आनंद शर्मा ने जिस स्पष्टता और दृढ़ता से मोदी सरकार की कूटनीति को परिपक्व और कुशल बताया है, उसने पूरी बहस को नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि भारत ने इस संकट में जिस संतुलन का परिचय दिया है, वही असली कूटनीति है। उन्होंने कहा है कि झुकना या किसी एक पक्ष की तरफ झुकाव दिखाना भारत जैसे देश के लिए खतरनाक हो सकता था। यह बयान सीधे तौर पर उन नेताओं के मुंह पर तमाचा है जो भारत की भूमिका को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं या उसे एक या दो देशों के पक्ष में झुका हुआ बता रहे हैं।
आनंद शर्मा ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि मानवीय भी है। खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा सर्वोपरि है। ऐसे में संतुलित नीति ही एकमात्र रास्ता है। उन्होंने भारतीय राजनयिकों की भी जमकर तारीफ की और कहा कि वह तिरंगे को ऊंचा रखकर देशवासियों की रक्षा कर रहे हैं। यह बयान उस सोच को मजबूत करता है कि जमीन पर काम करने वाले लोग ही असली नायक होते हैं, न कि केवल बयानबाजी करने वाले नेता।
दिलचस्प बात यह है कि यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने मोदी सरकार की विदेश नीति को सराहा हो। इससे पहले शशि थरूर और मनीष तिवारी भी इसी लाइन पर बोल चुके हैं। मनीष तिवारी ने तो साफ कहा कि यह भारत का युद्ध नहीं है और सरकार ने रणनीतिक स्वायत्तता का सही परिचय दिया है। उन्होंने यह भी माना कि ऊर्जा सुरक्षा, उर्वरक आपूर्ति और क्षेत्र में बसे करोड़ों भारतीयों के हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार सही दिशा में आगे बढ़ रही है।
दूसरी तरफ कांग्रेस के कुछ नेता अब भी सरकार पर हमला करने से बाज नहीं आ रहे हैं। पवन खेड़ा ने जहां भारत की वैश्विक भूमिका पर सवाल उठाए, वहीं जयराम रमेश ने इसे कूटनीतिक विफलता तक बता दिया। लेकिन सवाल यह है कि जब उनकी ही पार्टी के अनुभवी और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार नेता सरकार की नीति को सही बता रहे हैं, तो क्या यह आलोचना केवल राजनीतिक मजबूरी बनकर रह गई है?
हम आपको बता दें कि आनंद शर्मा ने एक और महत्वपूर्ण बात कही जो इस पूरे विवाद का सार है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में राजनीतिक दलों को दलगत राजनीति से ऊपर उठना चाहिए और राष्ट्रीय एकता का परिचय देना चाहिए। इस मुद्दे को राजनीतिक बहस में बदलना देश के साथ अन्याय होगा। उनका यह बयान सीधे तौर पर उन नेताओं को आईना दिखाता है जो हर मुद्दे को राजनीतिक लाभ के नजरिए से देखते हैं।
देखा जाये तो पश्चिम एशिया का यह संकट केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। कच्चे तेल, गैस और अन्य संसाधनों पर निर्भर देशों के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन चुका है। आनंद शर्मा ने इसे इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा संकटों में से एक बताया है। ऐसे समय में भारत का संतुलित रुख न केवल जरूरी है बल्कि अनिवार्य भी है।
सबसे बड़ी बात यह है कि भारत ने अब तक अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की है। जहाजों का सुरक्षित संचालन और जरूरत पड़ने पर उन्हें मोड़ना यह दिखाता है कि सरकार केवल बयान नहीं दे रही बल्कि जमीन पर काम भी कर रही है। यह वही पहलू है जिसे अक्सर विपक्ष नजरअंदाज कर देता है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो यह पूरा घटनाक्रम कांग्रेस के भीतर की असहज सच्चाई को उजागर कर रहा है। एक तरफ राहुल गांधी की आक्रामक आलोचना है, दूसरी तरफ उन्हीं की पार्टी के अनुभवी नेताओं की संतुलित और व्यावहारिक सोच है। यह टकराव आने वाले समय में और गहरा सकता है।
बहरहाल, मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन जब अपने ही दल के वरिष्ठ नेता उसकी तारीफ करें, तो यह साफ संकेत होता है कि सच्चाई कुछ और ही है। अब देखना यह है कि कांग्रेस इस अंदरूनी विरोधाभास को कैसे संभालती है या फिर यह दरार और चौड़ी होती जाती है।