पश्चिम एशिया में इजराइल ईरान और अमेरिका के बीच बने अस्थाई संघर्षविराम ने दुनिया को भले ही कुछ समय के लिए राहत दी हो, लेकिन इस शांति की सतह के नीचे एक बड़ा कूटनीतिक खेल चल रहा है। और इस खेल में भारत निर्णायक भूमिका निभा रहा है। नई दिल्ली से लेकर पोर्ट लुईस, वाशिंगटन और दोहा तक भारतीय कूटनीति एक साथ कई दिशाओं में तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही है। विदेश मंत्री एस जयशंकर, विदेश सचिव विक्रम मिसरी और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी की सक्रियता इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब वैश्विक समीकरणों को अपने हिसाब से ढालने की स्थिति में आ चुका है।
सबसे पहले बात करें विदेश मंत्री एस जयशंकर की, तो उनकी मॉरिशस यात्रा भारत की समुद्री और सामरिक रणनीति का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरी है। पोर्ट लुईस में उन्होंने साफ कहा कि पश्चिम एशिया संकट ने मजबूत रणनीतिक साझेदारी की जरूरत को और ज्यादा जरूरी बना दिया है, खासकर ऊर्जा के क्षेत्र में। हम आपको बता दें कि भारत और मॉरिशस के बीच तेल और गैस आपूर्ति को लेकर सरकार से सरकार स्तर पर समझौता अंतिम चरण में है, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा को एक नया आधार देगा।
जयशंकर ने यह भी स्पष्ट किया कि पिछले एक वर्ष में दोनों देशों के संबंधों में अभूतपूर्व गहराई आई है, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के बाद जब इस रिश्ते को उन्नत रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया गया था। समुद्री सहयोग, विकास साझेदारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और जन संपर्क जैसे क्षेत्रों में तेजी से विस्तार इस बात का प्रमाण है कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी पकड़ लगातार मजबूत कर रहा है। मॉरिशस में रक्षा अताशे की तैनाती की घोषणा इस दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम है।
इसके अलावा, मॉरिशस से आगे बढ़ते हुए जयशंकर का यूएई दौरा और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। यह पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद किसी भारतीय मंत्री की पहली यूएई यात्रा है, और इसका सबसे बड़ा एजेंडा है ऊर्जा सुरक्षा। ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष ने तेल और गैस आपूर्ति को प्रभावित किया है, साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर भी खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति बिना किसी रुकावट के जारी रहे।
अब नजर डालते हैं विदेश सचिव विक्रम मिसरी की अमेरिका यात्रा पर, जो भारत अमेरिका संबंधों के नए अध्याय को लिख रही है। वाशिंगटन में उनकी मुलाकात अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से हुई, जिसमें व्यापार, रक्षा, महत्वपूर्ण खनिज और क्वाड जैसे अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। यह मुलाकात बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के बीच भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक नजदीकी का संकेत थी।
विक्रम मिसरी ने अमेरिकी प्रशासन के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से भी मुलाकात की और क्षेत्रीय व वैश्विक मुद्दों पर गहन चर्चा की। दोनों देशों ने यह साफ किया कि वह केवल साझेदार नहीं बल्कि ऐसे रणनीतिक सहयोगी हैं जो वैश्विक स्थिरता और सुरक्षा में साझा भूमिका निभाना चाहते हैं। अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने भी इस बैठक को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए संकेत दिया कि आने वाले समय में यह साझेदारी और मजबूत होगी, यहां तक कि अमेरिकी विदेश मंत्री का भारत दौरा भी जल्द संभव है। विक्रम मिसरी की अमेरिका यात्रा के बारे में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि विदेश सचिव ने अमेरिका के आर्थिक मामलों के अवर विदेश सचिव जैकब हेलबर्ग के साथ भारत-अमेरिका के बीच तकनीकी सहयोग को और गहरा करने पर चर्चा की। इस दौरान उन्होंने मज़बूत सप्लाई चेन के लिए साझा दृष्टिकोण और सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिज, क्वांटम, AI, परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग, तथा ‘पैक्स सिलिका’ पहल को लागू करने की दिशा में अगले कदमों पर बातचीत की। इससे पहले विक्रम मिसरी की मुलाकात एफबीआई के निदेशक काश पटेल से भी हुई। इस बारे में वाशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने बताया कि दोनों के बीच आतंकवाद, संगठित अपराध और नशीले पदार्थों की रोकथाम में भारत-अमेरिका के मज़बूत सहयोग पर विचारों का सार्थक आदान-प्रदान हुआ। देखा जाए तो इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत अब वैश्विक राजनीति में संतुलन बनाने वाला देश नहीं बल्कि संतुलन तय करने वाला देश बनता जा रहा है।
अब बात करते हैं पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी की कतर यात्रा की, जो इस पूरी कूटनीतिक रणनीति का सबसे संवेदनशील और व्यावहारिक पक्ष है। कतर इस समय गंभीर संकट से गुजर रहा है। पश्चिम एशिया में जारी हमलों के कारण उसकी गैस उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है और एलएनजी उत्पादन तक रोकना पड़ा है। यह स्थिति वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए चिंता का विषय बन गई है।
भारत, जो कतर से बड़ी मात्रा में गैस आयात करता है, इस संकट को हल्के में नहीं ले सकता। यही वजह है कि पुरी का दोहा दौरा बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान भारत और कतर के बीच ऊर्जा सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया गया, साथ ही आपूर्ति में आई बाधाओं और उनके समाधान पर भी गंभीर चर्चा हुई।
यह दौरा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब ऊर्जा के मामले में किसी भी तरह की अनिश्चितता को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। वह अपने लिए सुरक्षित, स्थिर और दीर्घकालिक ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कदम उठा रहा है।
अगर इन तीनों यात्राओं को एक साथ देखा जाए, तो यह साफ हो जाता है कि भारत एक बहुस्तरीय कूटनीतिक रणनीति पर काम कर रहा है। एक तरफ वह हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सामरिक पकड़ मजबूत कर रहा है, दूसरी तरफ अमेरिका के साथ अपने संबंधों को नई ऊंचाई दे रहा है और साथ ही खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित कर रहा है। यह सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वैश्विक रणनीति है, जिसमें भारत हर मोर्चे पर सक्रिय है और हर चाल सोच समझकर चल रहा है।
बहरहाल, यह कहना गलत नहीं होगा कि इजराइल ईरान अमेरिका संघर्षविराम के इस दौर में भारत ने खुद को एक ऐसे देश के रूप में स्थापित किया है जो केवल हालात का हिस्सा नहीं बल्कि उन्हें दिशा देने की क्षमता रखता है। यह नया भारत है, जो न सिर्फ अपने हितों की रक्षा करता है बल्कि वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर खेलता भी है।
-नीरज कुमार दुबे