देश के ‘पीएम इन वेटिंग’ और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलियों और आतंकवादियों की कमर तोड़ने में अभूतपूर्व और उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि भारत अभी पूरी तरह नक्सलवाद और आतंकवाद मुक्त हुआ है। हां, सरकार की कोशिशें सराहनीय हैं। यदि शाह अपने नेक मकसद में कामयाब हुए तो प्रधानमंत्री पद की उनकी दावेदारी और पुख्ता हो जाएगी, क्योंकि उन्होंने मनमाफिक राष्ट्रीय टीम पहले से ही बना रखी है।
यह ठीक है कि सरकार ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को समाप्त करने का लक्ष्य रखा था, और आतंकवाद समाप्ति को लेकर ऐसा कोई दुरूह लक्ष्य घोषित नहीं किया गया था और कड़ी कार्रवाई गतिमान है, लेकिन पूरे देश की बात छोड़ दी जाए तो खुद दिल्ली-एनसीआर से ब्रेक के बाद सामने आने वाले मामले इस बात की चुगली कर रहे हैं कि उद्देश्यपूर्ति काफी जटिल है।
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ऐसा इसलिए कि नक्सलियों और आतंकवादियों को बौद्धिक और आर्थिक खुराक देने वाली जमात राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक हलकों में सक्रिय हैं! प्रशासनिक गलियारों तक में इनकी जातिवादी और सांप्रदायिक पैठ है।जबतक इनकी शिनाख्त और गिरफ्तारी नहीं होती, उद्देश्य अधूरा रहेगा। संभव हो कुछ तत्व सत्ताधारी दल से भी डायरेक्ट या भाया मीडिया सम्बन्धित हों।
आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में नक्सली गतिविधियाँ बनी हुई हैं। फरवरी 2026 तक नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या घटकर 6-7 रह गई थी, मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र (बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर) में। वहीं, मार्च 2026 के अंत में सुकमा में नक्सली मुठभेड़ हुई, जहाँ एक नक्सली मारा गया।
गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा कि नक्सलवाद लगभग समाप्ति की कगार पर है, लेकिन औपचारिक घोषणा प्रक्रिया पूरी होने पर होगी। सरकारी दावा करते हुए अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को लोकसभा में कहा कि “देश नक्सल मुक्त हो चुका है” और “नक्सलवाद विलुप्ति की ओर है।” 31 मार्च 2026 की डेडलाइन के ठीक पहले भी ऑपरेशन चल रहे थे, जिसमें सैकड़ों नक्सली मारे गए या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। फिर भी, बस्तर जैसे क्षेत्रों में सीमित गतिविधियाँ जारी हैं।
प्रगति के आंकड़े बताते हैं कि नक्सल प्रभावित जिले 126 (2010) से घटकर 6-7 (2026) पर पहुंच गए और ज्यादातर नक्सली मारे गए। 700+ तो हाल के वर्षों में।वहीं, आत्मसमर्पण करने वाले 4,800+ नक्सली दूसरे धंधों में जुड़ चुके हैं। बहरहाल, नक्सलवाद बहुत कमजोर हो चुका है, लेकिन पूर्ण मुक्ति की घोषणा अभी बाकी है। भारत में नक्सल प्रभावित 6 जिलों की स्थिति काफी संवेदनशील बनी हुई है, जहाँ सुरक्षा बल लगातार अभियान चला रहे हैं। ये जिले मुख्यतः छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में केंद्रित हैं।
वहीं, सबसे अधिक प्रभावित जिले निम्नलिखित 6 जिले हैं, जिनके नाम छत्तीसगढ़ (बीजापुर, कांकेर/नारायणपुर, नारायणपुर, सुकमा), झारखंड (पश्चिमी सिंहभूम), और महाराष्ट्र (गढ़चिरौली) हैं। इनमें नक्सली गतिविधियाँ सीमित लेकिन सक्रिय हैं, जैसे छिपे हुए कैंप और छोटे हमले। सुरक्षा बलों ने हाल के ऑपरेशनों से इन क्षेत्रों में घुसपैठ बढ़ाई है।
जहां तक वर्तमान अभियान की बात है तो छत्तीसगढ़ के सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और गरियाबंद (कभी-कभी सूचीबद्ध) में हाई-अलर्ट सर्च ऑपरेशन चल रहे हैं। सरकार ने अंतिम बड़े अभियान की तैयारी की है, जिसमें आत्मसमर्पण और मुठभेड़ों पर जोर है। मार्च 2026 तक हिंसा में भारी कमी आई, लेकिन पूर्ण नियंत्रण बाकी है।वहीं प्रगति संकेत यह है कि नक्सली संख्या घटी, सैकड़ों आत्मसमर्पण हुए। विकास परियोजनाएँ शुरू हुईं, जैसे सड़कें और स्कूल।
फिर भी, जंगलों में छिटपुट गतिविधियाँ जारी हैं। लिहाजा, 31 मार्च 2026 की डेडलाइन के बाद भी इन जिलों पर फोकस रहेगा। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने नक्सल प्रभावित 6 जिलों (मुख्यतः छत्तीसगढ़ के बीजापुर, कांकेर/नारायणपुर, सुकमा, झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम, महाराष्ट्र का गढ़चिरोली) को नक्सल मुक्त करने के लिए बहुआया रणनीति अपनाई है। यह योजना 31 मार्च 2026 तक पूर्ण मुक्ति का लक्ष्य रखती है, जिसमें सुरक्षा अभियान, आत्मसमर्पण नीति और विकास पर जोर है। सुरक्षा अभियान भी जारी है।
सुरक्षा बलों ने इन जिलों में सघन सर्च ऑपरेशन तेज कर दिए हैं, जैसे कुर्रेगुट्टालू पहाड़ मॉडल पर आधारित लंबे अभियान। नक्सलियों के सहयोगी नेटवर्क (एड नेटवर्क) को निशाना बनाया जा रहा है, साथ ही 576 मजबूत पुलिस स्टेशन और 336 नए कैंप स्थापित किए गए। मुठभेड़ों और घेराबंदी से नक्सली कमांडरों को खत्म करने पर फोकस है।
वहीं नक्सलियों के आत्मसमर्पण और पुनर्वास पर बल दिया गया है। नक्सलियों के आत्मसमर्पण को प्रोत्साहित करने के लिए उदार नीति लागू है, जिसमें वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और रोजगार दिया जाता है। हाल के वर्षों में हजारों नक्सली सरेंडर कर चुके हैं। पकड़े गए या आत्मसमर्पित नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए कौशल विकास केंद्र खोले जा रहे हैं। विकास पहल तेज है। इन जिलों में 137 केंद्र योजनाओं का तेज वितरण, सड़कें, स्कूल, अस्पताल और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान स्थापित हो रहे। एसआरई योजना के तहत क्षमता निर्माण जारी रहेगा ताकि नक्सलवाद न लौटे। 10-सूत्री योजना में वित्तीय सहायता प्रणाली तोड़ना और स्थानीय विकास शामिल है।
फिर भी अपेक्षित परिणाम की उम्मीद पूरी होनी अभी बाकी है। सरकार ने ठीक ही कहा है कि 31 मार्च 2026 के बाद ‘अर्बन नक्सल’ पर नजर रखी जाएगी। ये प्रयास नक्सलवाद को जड़ से समाप्त करने के करीब हैं, लेकिन जंगलों में छिटपुट चुनौतियाँ बाकी हैं। रही गई बात आतंकवाद की तो इसे पर्दे के पीछे से धर्म और डिप्लोमैट बढ़ावा दे रहे हैं, इसलिए इनसे निबटने में अभी वक्त लगेगा।
– कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
