भारत की सामरिक बिसात पर ईरान का चाबहार बंदरगाह एक बार फिर सबसे गर्म मुद्दा बन चुका है। अमेरिका द्वारा दी गई प्रतिबंध छूट खत्म होने की कगार पर है और इसी के साथ नई दिल्ली ने कूटनीतिक मोर्चे पर पूरी ताकत झोंक दी है। एक तरफ भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी अमेरिका जा रहे हैं तो दूसरी ओर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ईरान के साथ नियमित संवाद बनाये हुए हैं। इस तरह भारत एक साथ वाशिंगटन और तेहरान दोनों से बातचीत कर रहा है ताकि चाबहार में अपने रणनीतिक हितों को किसी भी कीमत पर सुरक्षित रखा जा सके। हम आपको बता दें कि यह कोई सामान्य व्यापारिक परियोजना नहीं, बल्कि एशिया में शक्ति संतुलन तय करने वाला निर्णायक दांव है।
अक्टूबर 2025 में भारत को छह महीने की छूट मिली थी, लेकिन अब समय सीमा खत्म होने वाली है। सूत्रों के अनुसार, भारत अमेरिकी प्रशासन से इस छूट को आगे बढ़ाने की मांग कर रहा है। साथ ही, ईरान के साथ एक वैकल्पिक व्यवस्था पर भी काम चल रहा है, जिसमें किसी स्थानीय इकाई के जरिए बंदरगाह का संचालन किया जा सके। इस योजना का सबसे अहम पहलू यह है कि जैसे ही प्रतिबंध हटेंगे, संचालन का पूरा नियंत्रण भारत को मिल जाएगा। साफ है कि भारत हर स्थिति के लिए बैकअप तैयार कर चुका है।
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विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरानी समकक्ष के बीच हालिया बातचीत ने यह साफ कर दिया है कि मामला केवल बंदरगाह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे क्षेत्रीय समीकरण से जुड़ा हुआ है। खासकर होरमुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले समुद्री मार्ग पर भारत की सक्रियता इस संघर्ष को और भी महत्वपूर्ण बना देती है। मध्य पूर्व में तनाव के बीच भारत के सबसे ज्यादा जहाज इसी मार्ग से गुजर रहे हैं और यही वजह है कि चाबहार का महत्व कई गुना बढ़ गया है।
हम आपको बता दें कि चाबहार बंदरगाह भारत के लिए केवल एक व्यापारिक केंद्र नहीं, बल्कि पाकिस्तान को दरकिनार करने का सबसे मजबूत हथियार है। यह बंदरगाह भारत को सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जोड़ता है, जिससे इस्लामाबाद की भौगोलिक बढ़त बेअसर हो जाती है। यही नहीं, यह परियोजना चीन की बेल्ट एंड रोड पहल और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के खिलाफ भारत की सबसे सटीक रणनीतिक चाल मानी जाती है।
हम आपको याद दिला दें कि 2024 में भारत ने ईरान के साथ दस साल का समझौता कर इस बंदरगाह के संचालन की जिम्मेदारी ली थी। इसके तहत करीब एक सौ बीस मिलियन डॉलर का निवेश और ढाई सौ मिलियन डॉलर का कर्ज निवेश शामिल है। यह केवल पैसा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का निवेश है। सड़क और रेल संपर्क के जरिए इसे अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे से जोड़ा जा रहा है, जिससे भारत की पहुंच रूस और यूरोप तक मजबूत होगी।
भौगोलिक दृष्टि से भी चाबहार का महत्व बेहद खास है। यह ओमान की खाड़ी और हिंद महासागर के पास स्थित है। गुजरात का कांडला बंदरगाह यहां से करीब पांच सौ पचास समुद्री मील दूर है, जबकि मुंबई से इसकी दूरी करीब सात सौ छियासी समुद्री मील है। यानी यह भारत के पश्चिमी तट के लिए एक प्राकृतिक रणनीतिक विस्तार है।
इसी बीच, विदेश सचिव विक्रम मिसरी का आठ से दस अप्रैल तक वाशिंगटन दौरा इस पूरे घटनाक्रम को और भी अहम बना देता है। इस यात्रा में भारत अमेरिका के साथ व्यापार, रक्षा, विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर व्यापक चर्चा करेगा। लेकिन असली फोकस चाबहार पर ही रहने वाला है। यह दौरा तय करेगा कि अमेरिका भारत के इस रणनीतिक दांव को समर्थन देता है या फिर दबाव की राजनीति जारी रखता है।
साफ शब्दों में कहें तो चाबहार बंदरगाह आज भारत की विदेश नीति का अग्निपरीक्षा बिंदु बन चुका है। एक तरफ अमेरिकी प्रतिबंधों का दबाव है, दूसरी तरफ ईरान के साथ संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। लेकिन भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने हितों से पीछे हटने वाला नहीं है।
बहरहाल, यह पूरा घटनाक्रम केवल एक बंदरगाह की कहानी नहीं, बल्कि एशिया में शक्ति संतुलन की जंग है। भारत यदि इस दांव में सफल होता है तो न केवल पाकिस्तान और चीन को करारा जवाब मिलेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार मार्गों पर भी उसकी पकड़ मजबूत होगी। यही वजह है कि चाबहार अब केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि भारत की सामरिक पहचान बन चुका है।
