अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले दो तीन दिन से बार बार यह दावा कर रहे थे कि अमेरिका जल्द ही इस जंग से बाहर निकल जाएगा और ईरान खुद संघर्षविराम चाहता है, लेकिन राष्ट्र के नाम अपने ताजा संबोधन में उन्होंने पूरी दुनिया को चौंकाते हुए जंग को आगे बढ़ाने का ऐलान कर दिया। इस अप्रत्याशित पलटवार ने वैश्विक मंच पर हलचल मचा दी है। दुनिया भर के शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है, क्योंकि साफ संकेत मिल रहे हैं कि यह संघर्ष लंबा खिंच सकता है और इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा, जिससे आम लोगों की जेब पर बड़ा बोझ आने वाला है। दुनिया को इंतजार था कि ट्रंप जंग खत्म होने का ऐलान करेंगे लेकिन उन्होंने युद्ध की आग में और घी डालने का काम कर दिया है। लगभग एक महीने से ज्यादा समय से चल रही इस जंग को खत्म करने की बजाय ट्रंप ने साफ संकेत दे दिया है कि आने वाले दो से तीन हफ्ते ईरान के लिए और भी ज्यादा विनाशकारी साबित हो सकते हैं।
ट्रंप ने अपने संबोधन में दावा किया कि अमेरिका ने ईरान की नौसेना और वायुसेना को लगभग पूरी तरह तबाह कर दिया है, साथ ही उसके बैलिस्टिक मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को भी गंभीर नुकसान पहुंचाया है। लेकिन इन दावों के बावजूद उन्होंने यह बताने से साफ इंकार कर दिया कि यह युद्ध कब खत्म होगा। यही अस्पष्टता इस पूरे संघर्ष को और ज्यादा खतरनाक बना रही है।
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सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि ट्रंप ने खुली चेतावनी देते हुए कहा कि अगर ईरान ने बातचीत के जरिए समझौता नहीं किया तो अमेरिका उसके बिजली उत्पादन और तेल ढांचे पर सीधा हमला करेगा। यह बयान केवल धमकी नहीं, बल्कि एक बड़े सैन्य अभियान की भूमिका तैयार करता दिख रहा है। ट्रंप ने ईरान को “पत्थर युग” में पहुंचाने की बात कही है, जो इस जंग की भयावहता को दर्शाती है।
इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है। तेल आपूर्ति का सबसे अहम मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य लगभग बंद हो चुका है, जिससे पूरी दुनिया में तेल की कीमतें उछल गई हैं। शेयर बाजार में गिरावट और मुद्रा बाजार में अस्थिरता इस बात का संकेत है कि यह जंग जल्द खत्म होने वाली नहीं है। ट्रंप ने हालांकि दावा किया कि युद्ध खत्म होते ही यह मार्ग अपने आप खुल जाएगा, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि यह कैसे संभव होगा।
उधर, अमेरिका के अंदर भी इस युद्ध को लेकर असंतोष तेजी से बढ़ रहा है। एक ताजा सर्वे के अनुसार करीब साठ प्रतिशत लोग इस जंग के खिलाफ हैं और चाहते हैं कि अमेरिका जल्द से जल्द इसमें अपनी भूमिका खत्म करे। लेकिन ट्रंप प्रशासन का रुख इससे बिल्कुल उलट दिखाई देता है। हजारों अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती और नए सैन्य विकल्पों पर विचार यह साफ करता है कि अमेरिका अभी पीछे हटने के मूड में नहीं है।
रणनीतिक स्तर पर देखें तो यह संघर्ष केवल अमेरिका और ईरान के बीच नहीं रह गया है। इजरायल की सक्रिय भूमिका, खाड़ी देशों की चिंता और नाटो सहयोगियों की अनिश्चितता ने इसे एक व्यापक भू-राजनीतिक संकट बना दिया है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण की लड़ाई वैश्विक शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल सकती है।
भारत के लिए भी यह स्थिति बेहद संवेदनशील है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी क्षेत्र पर काफी निर्भर है। अगर यह संघर्ष और लंबा खिंचता है तो भारत में तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिससे महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ेगा। इसके अलावा क्षेत्रीय अस्थिरता भारतीय व्यापार और समुद्री मार्गों को भी प्रभावित कर सकती है।
साथ ही ट्रंप का यह बयान कि “हमारे पास सभी पत्ते हैं और उनके पास कोई नहीं”, एक तरह से आत्मविश्वास से ज्यादा आक्रामक रणनीति का संकेत देता है। लेकिन जमीन पर हालात इतने आसान नहीं हैं। दोहा और तेल अवीव में बजते सायरन यह साबित करते हैं कि ईरान अभी भी जवाबी हमला करने में सक्षम है और यह जंग किसी भी समय और ज्यादा भड़क सकती है।
कुल मिलाकर यह संघर्ष अब एक निर्णायक मोड़ पर है जहां एक गलत कदम पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंक सकता है। ट्रंप का आक्रामक रुख और स्पष्ट रणनीति का अभाव इस संकट को और गहरा बना रहा है। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह टकराव सीमित रहेगा या फिर एक बड़े वैश्विक युद्ध का रूप ले लेगा।
