प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के दिवंगत नेता अशोक सिंघल की जन्मशती के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि दी और कहा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण उनके जैसे उन दिग्गजों के कारण संभव हो सका, जिन्होंने इसे साकार करने के प्रयास में निस्वार्थ भाव से खुद को समर्पित कर दिया था। विहिप नेता की जयंती के एक दिन बाद प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित अपने हस्ताक्षरित आलेख में मोदी ने कहा कि सिंघल को विचारों की असाधारण स्पष्टता का वरदान प्राप्त था। उन्होंने कहा कि यह स्पष्टता एक बात में विशेष रूप से दिखाई देती थी कि उनका मानना था कि ‘‘देश का समाज सौहार्दपूर्ण होना चाहिए’’ और ‘‘भाईचारे के संदेश को फिर से मजबूती से स्थापित किया जाना चाहिए।’’
प्रधानमंत्री ने कहा कि राम जन्मभूमि आंदोलन में सिंघल की ऐतिहासिक भूमिका का स्मरण किए बिना उनका कोई भी उल्लेख पूरा नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा, ‘‘1991 में बोट क्लब रैली में उनके संबोधन को कौन भूल सकता है? या आंदोलन के चरम पर लहूलुहान अशोक जी की वह तस्वीर। आज अगर अयोध्या में भव्य राम मंदिर है, तो यह उनके जैसी विभूतियों की वजह से है, जिन्होंने इसे संभव बनाने के प्रयास में निस्वार्थ भाव से खुद को समर्पित कर दिया था।’’
मोदी ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर को आकार लेते देखकर सिंघल सबसे अधिक खुश होते।
मुखर हिंदुत्ववादी नेता सिंघल का जन्म 27 सितंबर 1926 को हुआ था और 17 नवंबर 2015 को उनका निधन हो गया। प्रधानमंत्री ने कहा कि सिंघल ने सामाजिक एकता और समानता को मजबूत करने की दिशा में काम किया तथा उनका दृढ़ विश्वास था कि समाज में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति समान गरिमा और सम्मान का हकदार है। उन्होंने कहा कि यह सिंघल की सोच थी कि अयोध्या में राम मंदिर की पहली ईंट बिहार के जमीनी स्तर पर काम करने वाले विहिप कार्यकर्ता कामेश्वर चौपाल द्वारा रखी जाए, जो समाज के वंचित वर्ग से आते थे।
मोदी ने कहा, ‘‘काशी (वाराणसी) में एक धर्म संसद में उन्होंने डोम राजा को सम्मानित करने का निर्णय लिया और विभिन्न सामुदायिक प्रयासों के तहत उनके साथ काम किया।’’
प्रधानमंत्री ने कहा कि सिंघल का मन लगातार इस बात पर विचार करता रहता था कि समाज के हाशिये पर मौजूद लोगों के लिए और क्या किया जा सकता है। सिंघल को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रतिबद्ध एक महान व्यक्तित्व बताते हुए मोदी ने कहा कि उन्होंने कई दशकों तक विहिप नेता को दिन-रात काम करते देखा और सिंघल अक्सर देश के सुदूर इलाकों की लंबी और कठिन यात्राएं किया करते थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि सिंघल को गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों की यात्रा करने का विशेष जुनून था।
उन्होंने 2001 के कच्छ भूकंप के बाद सिंघल के साथ अपने अनुभव को अविस्मरणीय बताया। उन्होंने कहा, ‘‘जब भी देश का कोई हिस्सा प्राकृतिक आपदा से प्रभावित होता था, अशोक जी या तो खुद वहां पहुंचने वाले शुरुआती लोगों में होते थे या प्रभावित लोगों की मदद के लिए ‘कार्यकर्ताओं’ का मार्गदर्शन करने वालों में शामिल होते थे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘दूसरों के प्रति करुणा और उनकी देखभाल की यह भावना अशोक जी के जीवन में बहुत कम उम्र में ही आ गई थी।’’
प्रधानमंत्री ने कहा कि 27 सितंबर से एक ऐसे असाधारण व्यक्तित्व की जन्मशती मनाई जा रही है, जिन्होंने आध्यात्मिक साधना, सांस्कृतिक जागरण और दशकों तक समर्पित भाव से समाज एवं संगठन के कार्यों का आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं कि मुझे अशोक जी के साथ अनगिनत बार बातचीत करने और उनका स्नेह प्राप्त करने का अवसर मिला।
ऐसी शुरुआती घटनाओं में से एक 1981 की है, जब मैं एक युवा कार्यकर्ता के रूप में मुझे सौंपे गए संगठनात्मक दायित्वों को निभा रहा था।’’
उन्होंने सिंघल का हाथ से लिखा एक पत्र याद किया, जो उन्हें एक महत्वपूर्ण आगामी कार्यक्रम के बारे में जानकारी देने और कुछ कार्य सौंपने के लिए मिला था। मोदी ने कहा कि सिंघल का जन्म एक अत्यंत प्रतिष्ठित और समृद्ध परिवार में हुआ था। उनके पिता महावीर सिंघल एक प्रतिष्ठित प्रशासक थे, जबकि उनके एक भाई बी. पी. सिंघल पुलिस अधिकारी बने और बाद में सांसद भी रहे।
प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके एक अन्य भाई वी. पी. सिंघल उस समय त्रिपुरा के मुख्य सचिव थे, जब राज्य का गठन ही हुआ था। परिवार के अन्य सदस्यों ने वाणिज्य और कृषि के क्षेत्र में भी सफलता हासिल की। उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन अशोक जी बचपन से ही किसी बिल्कुल अलग चीज की ओर आकर्षित थे- भारत के पुनरुत्थान और मां भारती की संतानों को गौरव दिलाने की ओर।’’
प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रयागराज में पले-बढ़े सिंघल घंटों संगम के किनारे बैठा करते थे।
उन्होंने कहा, ‘‘नदी स्वाभाविक रूप से उन्हें आकर्षित करती थी, लेकिन वहां आने वाले संतों, ऋषियों और श्रद्धालुओं में भी उनकी रुचि थी। इससे भारत की सांस्कृतिक चेतना की उनकी समझ विकसित हुई और समाज के लिए कुछ करने का उनका संकल्प मजबूत हुआ।’’
मोदी ने कहा कि दूसरों के लिए जीने की इस इच्छा ने सिंघल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ओर आकर्षित किया और उन्होंने अपने सामने आने वाली हर जिम्मेदारी को उत्साह, अनुशासन और कर्तव्यबोध के साथ स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि सिंघल ने दृढ़ता और कड़ी मेहनत के जरिए संस्थानों और आंदोलनों को मजबूत किया।
मोदी ने कहा कि विहिप नेता को प्रभावशाली आवाज और ऐसा वक्तृत्व कौशल प्राप्त था, जो पूरी सभा को मंत्रमुग्ध कर सकता था। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके मन में सिंघल के ‘‘किंवदंती समान व्यक्तित्व’’ को सामने लाने वाली दो घटनाएं विशेष रूप से आती हैं। उन्होंने कहा कि पहली घटना 1993 की है, जब विहिप ने स्वामी विवेकानंद के शिकागो संबोधन के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अमेरिका में एक सम्मेलन आयोजित किया था।
उन्होंने कहा, ‘‘विदेश में इस तरह के सम्मेलन के आयोजन की परिकल्पना, इसकी योजना बनाना और विभिन्न पक्षों को एक साथ लाना अशोक जी की संगठनात्मक प्रतिभा को दर्शाता था।’’
मोदी ने कहा कि दूसरी घटना वर्ष 2000 की है, जब त्रिनिदाद और टोबैगो के पोर्ट ऑफ स्पेन में विश्व हिंदू सम्मेलन आयोजित किया गया था। उन्होंने कहा, ‘‘मैं देख सकता था कि उनकी मौजूदगी ने दूसरे प्रतिनिधियों में कितना उत्साह भर दिया था। मेरे संबोधन के बाद उनके द्वारा की गई प्रशंसा मेरे लिए बेहद भावुक कर देने वाला अनुभव था।
मैंने एक बार फिर देखा कि उनका प्रोत्साहन हर कार्यकर्ता में कितनी ऊर्जा भर देता था।’’
प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्र निर्माण के अलावा दो क्षेत्र ऐसे थे, जो सिंघल के दिल के बेहद करीब थे – शिक्षा, विशेष रूप से वैदिक शिक्षा, और संगीत। उन्होंने कहा, ‘‘वाराणसी के सांसद के रूप में मुझे इस बात पर बहुत गर्व है कि जिस शहर का मैं प्रतिनिधित्व करता हूं, उस सनातन काशी ने श्री अशोक सिंघल जी के जीवन में अपनी भूमिका निभाई है।’’
मोदी ने कहा कि सिंघल ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी और वह एक अच्छे विद्यार्थी के रूप में भी जाने जाते थे। उन्होंने कहा कि सिंघल ‘एकल विद्यालय’ पहल से भी निकटता से जुड़े थे, जिसका उद्देश्य दूरदराज के गांवों, विशेषकर आदिवासी समुदायों के बीच बुनियादी शिक्षा का विस्तार करना था।
प्रधानमंत्री ने कहा कि सिंघल बहुत अधिक पढ़ने वाले व्यक्ति थे और अच्छे श्रोता भी थे। वह हमेशा युवा कार्यकर्ताओं से अधिक से अधिक पढ़ने के लिए कहते थे। उन्होंने कहा, ‘‘जो लोग अशोक जी को करीब से जानते थे, वे जानते थे कि वह कितना अच्छा गाते थे।
मुझे नागपुर में हुई बैठकें याद हैं, जहां वह ‘एकल गीत’ गाते थे। उनकी आवाज सभी को मंत्रमुग्ध कर देती थी।’’
सिंघल की जन्मशती के अवसर पर मोदी ने युवाओं की नयी पीढ़ी को उनकी विरासत और महानता से परिचित कराने के प्रयास किए जाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, ‘‘आइए, हम अपने राष्ट्र के लिए अशोक सिंघल के सपनों को साकार करने के संकल्प को एक बार फिर दोहराएं।
