रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए भारत की युद्ध-तैयारी को नई धार देने की दिशा में बड़ा फैसला किया है। DRDO द्वारा विकसित पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक निजी भारतीय कंपनियों को देने की मंजूरी देकर भारत ने चीन और पाकिस्तान को भी चौंकाने वाला संदेश दिया है। जहां चीन और पाकिस्तान में मिसाइल निर्माण मुख्यतः सरकारी रक्षा कंपनियों के हाथों में केंद्रित है, वहीं भारत अब सरकारी उपक्रमों के साथ-साथ निजी उद्योगों को भी इस सामरिक उत्पादन श्रृंखला में उतार रहा है। इसका मतलब है कि भविष्य में युद्ध की स्थिति में भारत के पास मिसाइल उत्पादन के कई स्रोत होंगे। यदि कभी चीन और पाकिस्तान के साथ एक साथ दो मोर्चों पर संघर्ष की स्थिति बनी, तो भारत केवल अपने मौजूदा भंडार पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक औद्योगिक नेटवर्क के सहारे उत्पादन बढ़ाकर दे दनादन, दे दनादन मिसाइलों की मारक क्षमता बनाए रखने की स्थिति में होगा। यह फैसला केवल ‘मेक इन इंडिया’ नहीं, बल्कि युद्ध के समय मिसाइल सप्लाई चेन को अटूट बनाए रखने की रणनीति है।
देखा जाये तो भारत ने अपनी रक्षा नीति में एक ऐसा निर्णायक कदम उठाया है, जो आने वाले वर्षों में देश की युद्ध क्षमता, सैन्य आपूर्ति श्रृंखला और सामरिक आत्मनिर्भरता की तस्वीर बदल सकता है। भारत की रक्षा नीति में जो बदलाव हुआ है उसका अर्थ यह है कि देश अब रक्षा अनुसंधान को सरकारी प्रयोगशाला से निकालकर बड़े पैमाने के औद्योगिक उत्पादन में बदलना चाहता है।
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इस नीति के दायरे में वायु रक्षा, हवा से हवा में मार करने वाली, टैंक रोधी और सतह से सतह पर मार करने वाली अनेक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक उद्योग तक पहुंच सकती है। इसमें आकाश, नाग, VSHORADS, अस्त्र, रुद्रम, प्रलय और मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक मिसाइलों जैसी प्रणालियां शामिल हैं। मिसाइल तकनीक का हस्तांतरण पात्रता, प्रमाणन और नियामकीय शर्तों के अधीन होगा। इसका सबसे बड़ा सामरिक लाभ यह है कि युद्ध के समय किसी एक सरकारी उत्पादन इकाई या सीमित आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता कम होगी और देश के भीतर व्यापक उत्पादन नेटवर्क तैयार किया जा सकेगा।
देखा जाये तो ईरान के साथ 2026 के संघर्ष ने दुनिया को एक कठोर सैन्य सबक दिया है। सबक यह है कि युद्ध में केवल मिसाइल तकनीक होना पर्याप्त नहीं है, उनके विशाल और लगातार भरते रहने वाले भंडार भी जरूरी हैं। CSIS के आकलन के अनुसार ईरान संघर्ष के दौरान अमेरिका के Patriot और THAAD इंटरसेप्टर भंडार पर भारी दबाव पड़ा; Patriot की उपलब्ध संख्या एक हजार से नीचे और THAAD लगभग 250 तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया। विश्लेषण में यह भी चेतावनी दी गई कि घटते भंडार अमेरिका को भविष्य के संघर्षों में इंटरसेप्शन के मामले में अधिक जोखिम लेने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
यही नहीं, कुछ आकलनों में अमेरिका द्वारा अपने पूर्व-युद्ध Patriot भंडार का लगभग दो-तिहाई तक इस्तेमाल होने की बात कही गई है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि उत्पादन क्षमता बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद Patriot और अन्य उन्नत इंटरसेप्टरों के भंडार को पुराने स्तर तक पहुंचाने में करीब तीन वर्ष या उससे अधिक लग सकते हैं। अन्य विश्लेषण यह भी बताते हैं कि Tomahawk जैसी मिसाइलों के नए उत्पादन में लंबा समय लगता है और उन्नत हथियारों की कमी दूर करना वर्षों का काम है।
इसके अलावा, इस तरह की भी रिपोर्टें आईं कि अमेरिका को दूसरे देशों में मौजूद अपने सैन्य अड्डों से मिसाइलें वापस मंगवानी पड़ीं। रिपोर्टों में कहा गया कि मध्य-पूर्व में मौजूद अमेरिकी और सहयोगी सैन्य नेटवर्क के संसाधनों, तैनाती और उत्पादन क्षमता पर भारी दबाव पड़ा और पेंटागन को भंडार भरने तथा उत्पादन तेज करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़े। यही इस पूरे घटनाक्रम का वास्तविक रणनीतिक संदेश है कि यदि एक बड़ी शक्ति का मिसाइल भंडार एक क्षेत्रीय युद्ध से इतना दबाव महसूस कर सकता है, तो एक साथ दो मोर्चों या किसी बड़े शक्ति संघर्ष की स्थिति कितनी चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
भारत के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी है। चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती वाले वातावरण में भारत किसी एक उत्पादन लाइन के भरोसे नहीं रह सकता। युद्ध लंबा खिंचा तो मिसाइलों का प्रश्न केवल “कौन सी मिसाइल बेहतर है” नहीं, बल्कि “कितनी जल्दी और कितनी संख्या में फिर बनाई जा सकती है” बन जाता है।
हम आपको यह भी बता दें कि भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में इसका सफल प्रयोग पहले ही कर चुका है। निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष गतिविधियां खोलने और IN-SPACe जैसे ढांचे के बाद Skyroot Aerospace और Agnikul Cosmos ने सब-ऑर्बिटल लॉन्च का सफल प्रदर्शन किया। Dhruva Space के नैनो-सैटेलाइट PSLV मिशन से लॉन्च हुए, जबकि Pixxel ने अपने पृथ्वी अवलोकन उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे। निजी कंपनियों को ISRO की सुविधाओं और तकनीकी समर्थन तक पहुंच भी दी गई।
अब रक्षा क्षेत्र, विशेषकर मिसाइल उत्पादन में वैसी ही औद्योगिक ऊर्जा पैदा करने की कोशिश दिखाई दे रही है। DRDO के Development-cum-Production Partner मॉडल के तहत मार्च 2026 तक 134 कंपनियां भागीदार बन चुकी थीं, 2180 तकनीक हस्तांतरण समझौते हुए और 2,780 से अधिक बौद्धिक संपदा अधिकार उद्योग के उपयोग के लिए खोले गए।
साथ ही रक्षा क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ने का आर्थिक प्रभाव भी स्पष्ट है। 2025-26 में भारत का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा, जिसमें निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत रही। रक्षा निर्यात 2013-14 के 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये पहुंच गया और भारत 80 से अधिक देशों को रक्षा उत्पाद निर्यात कर रहा है। इस निर्यात में निजी क्षेत्र का योगदान 17,353 करोड़ रुपये, यानी 45.16 प्रतिशत रहा।
यही कारण है कि मिसाइल तकनीक हस्तांतरण को केवल औद्योगिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय युद्ध तैयारी की नीति के रूप में देखना चाहिए। अधिक कंपनियां उत्पादन में उतरेंगी तो क्षमता बढ़ेगी, आपूर्ति श्रृंखला फैलेगी, MSME जुड़ेंगे, तकनीकी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और युद्धकाल में उत्पादन को तेजी से बढ़ाने की संभावना मजबूत होगी।
बहरहाल, अब भारत का सामरिक लक्ष्य सिर्फ मिसाइल बनाना ही नहीं, बल्कि युद्ध के दौरान उन्हें लगातार बनाते रहने की क्षमता हासिल करना है। अमेरिका-ईरान संघर्ष ने बता दिया है कि आधुनिक युद्ध में गोला बारूद और मिसाइलों का भंडार किसी भी महाशक्ति की कमजोर नस बन सकता है। भारत ने समय रहते इस सबक को समझ लिया तो DRDO की तकनीक और निजी उद्योग की उत्पादन क्षमता का यह गठजोड़ आने वाले दशक में भारत की सबसे बड़ी सामरिक ताकतों में से एक साबित हो सकता है।
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
