सोशल मीडिया इस समय ऐसे वीडियोज से भरा पड़ा है, जिनमें बलूचिस्तान के लोग अपनी आजादी का जश्न मनाते हुए नजर आ रहे हैं। 11 अगस्त को बलूचिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के तौर पर मनाए गए कार्यक्रमों के बीच बलूच अलगाववादी नेतृत्व ने अब अपने अभियान को एक नया राजनीतिक मोड़ देने की कोशिश भी की है। बलूच नेता मीर यार बलूच ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से “रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान” को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने की अपील की है। साथ ही भारत की ओर से पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर उठाई गई आवाज की खुलकर सराहना की है।
मीर यार बलूच ने एक्स पर जारी अपने संदेश में भारतीय मीडिया का विशेष रूप से आभार जताया। उनका कहना था कि भारतीय मीडिया ने 11 अगस्त को बलूचिस्तान में मनाए गए स्वतंत्रता दिवस को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के उस बयान का भी स्वागत किया, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर और उसके नियंत्रण वाले अन्य क्षेत्रों में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने की जरूरत पर जोर दिया गया था। हालांकि जायसवाल ने बलूचिस्तान का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया था, लेकिन बलूच नेतृत्व ने भारत के इस व्यापक मानवाधिकार रुख को अपने पक्ष में महत्वपूर्ण संकेत के तौर पर पेश किया है।
इसे भी पढ़ें: Jan Gan Man: ‘आजादी’ का जश्न मनाते हुए झूम उठा पूरा Balochistan ! बीच-बीच में बाधा डाल रहा है Pakistan
यही वह बिंदु है जो इस पूरे घटनाक्रम को केवल बलूचिस्तान के भीतर चल रहे अलगाववादी आंदोलन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना देता है। बलूच नेतृत्व अब अपने आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय वैधता दिलाने की दिशा में ले जाने का दावा कर रहा है। उसके संदेश में संयुक्त राष्ट्र, आसियान, अफ्रीकी संघ, इस्लामिक सहयोग संगठन और यूरोपीय देशों से बलूचिस्तान के पक्ष में आवाज उठाने की अपील की गई है। संगठन का दावा है कि अब लड़ाई केवल स्वतंत्रता दिवस मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता की कानूनी, राजनीतिक, कूटनीतिक और नैतिक मान्यता हासिल करने की है।
बलूच नेतृत्व ने 11 अगस्त की तारीख को भी ऐतिहासिक आधार देने की कोशिश की है। उसका दावा है कि ब्रिटिश शासन के अंत और भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन से ठीक पहले 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान ने स्वतंत्रता की घोषणा की थी। इसी ऐतिहासिक दावे को आधार बनाकर मौजूदा अभियान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता की लड़ाई बताया जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के इस दावे को मान्यता नहीं देते और बलूचिस्तान को पाकिस्तान का एक प्रांत माना जाता है।
वैसे इस अभियान का अगला चरण और भी महत्वपूर्ण है। बलूच समूह ने दावा किया है कि भविष्य के स्वतंत्र राष्ट्र के लिए विदेश नीति, रक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति और कूटनीति से जुड़े ढांचे तैयार किए जा रहे हैं। उसने पासपोर्ट, अपनी मुद्रा, मीडिया संस्थानों, व्यापारिक संस्थाओं और विदेशों में राजनयिक मिशनों की तैयारी का भी दावा किया है। साथ ही अलग-अलग बलूच राजनीतिक धाराओं को एकजुट करने की कोशिश की बात कही गई है।
बलूच नेतृत्व ने पाकिस्तान पर दमन का भी गंभीर आरोप लगाया है। उसके मुताबिक 50 हजार से अधिक बलूच लोग अब भी यातना केंद्रों में अमानवीय परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। बलूचों ने जबरन गुमशुदगी, हिरासत और लक्षित हत्याओं जैसे मुद्दों को भी उठाया है। बलूचों के समूह ने यह भी आरोप लगाया कि स्वतंत्रता दिवस समारोह रोकने के लिए मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं, सैन्य छावनियों और पुलिस प्रतिष्ठानों के आसपास खाइयां खोदी गईं तथा ड्रोन, हेलीकॉप्टर और सैन्य विमानों से निगरानी की गई।
रणनीतिक रूप से देखें तो बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए बेहद संवेदनशील भूभाग है। क्षेत्रफल के लिहाज से यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध माना जाता है। बलूच नेतृत्व का दावा है कि स्वतंत्र बलूचिस्तान अपने संसाधनों के जरिये स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय सहायता के क्षेत्र में योगदान दे सकता है। यही संसाधन, भौगोलिक स्थिति और लंबे समय से जारी विद्रोह इसे पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय भू-राजनीति का भी अहम मुद्दा बनाते हैं।
भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बलूचिस्तान का मुद्दा पाकिस्तान के उस नैरेटिव को चुनौती देता है, जिसमें वह जम्मू-कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार उठाता रहा है। बलूच नेतृत्व का भारत की मीडिया और विदेश मंत्रालय के बयानों को अपने पक्ष में उद्धृत करना पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश है। हालांकि भारत की ओर से बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को मान्यता देने की कोई घोषणा इन स्रोतों में नहीं है।
बहरहाल, बलूचिस्तान में चल रहा संघर्ष अब केवल बंदूक और सुरक्षा बलों के बीच की लड़ाई नहीं रह गया है। यह इतिहास, मानवाधिकार, संसाधनों, अंतरराष्ट्रीय मान्यता और सूचना युद्ध, इन सभी मोर्चों पर लड़ी जा रही लड़ाई बनता जा रहा है। और जिस तरह बलूच नेतृत्व भारत का सार्वजनिक रूप से आभार जता रहा है, उससे साफ है कि वह इस संघर्ष को पाकिस्तान की सीमाओं से बाहर निकालकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मैदान में ले जाना चाहता है।
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
