असम में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ हिमंत बिस्व सरमा सरकार ने एक बार फिर सख्त संदेश देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि राज्य की सीमा, सुरक्षा और अस्मिता से खिलवाड़ करने वालों के लिए अब कोई जगह नहीं है। 29 जुलाई की रात सुरक्षा बलों ने 21 अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को चिन्हित कर सीमा पार वापस भेज दिया, जबकि इससे एक दिन पहले 18 अन्य घुसपैठियों के विरुद्ध भी यही कार्रवाई की गई थी। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने दो टूक कहा कि असम में अवैध रूप से घुसकर बसने की हर कोशिश नाकाम की जाएगी और राज्य की सुरक्षा तथा पहचान को कमजोर करने वाले किसी भी तत्व के खिलाफ बिना किसी ढिलाई के कार्रवाई जारी रहेगी। उनका स्पष्ट संदेश है कि असम में अवैध घुसपैठ की राह अब बंद हो चुकी है और कानून तोड़कर प्रवेश करने वालों के लिए यहां कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं है।
हम आपको बता दें कि असम सरकार के अनुसार पिछले दो वर्षों में राज्य से 1,679 बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजा जा चुका है। मुख्यमंत्री ने विधानसभा में बताया कि 1 जुलाई 2024 से 30 जून 2026 के बीच यह कार्रवाई केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों तथा Immigrants (Expulsion from Assam) Act, 1950 के प्रावधानों के अनुरूप की गई। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन मामलों पर उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई लंबित होती है, उनमें निर्वासन की कार्रवाई नहीं की जाती। जिन लोगों को वापस भेजा गया है, वे या तो विदेशी न्यायाधिकरण द्वारा घोषित विदेशी, दोषसिद्ध विदेशी अथवा ताजा अवैध घुसपैठिए थे।
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वहीं विधानसभा में एआईयूडीएफ विधायक बदरुद्दीन अजमल ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए निर्वासन की कानूनी प्रक्रिया, न्यायिक अपील और बांग्लादेश से समन्वय की जानकारी मांगी। जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया कि नागरिकता और विदेशी सरकारों से समन्वय पूरी तरह केंद्र सरकार का विषय है, जबकि राज्य सरकार केवल केंद्र के निर्देशों और कानून के अनुसार कार्रवाई करती है। साथ ही यह भी कहा गया कि पूरी प्रक्रिया के दौरान मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक सावधानियां बरती जाती हैं। हम आपको बता दें कि कांग्रेस और एआईयूडीएफ लगातार इस अभियान का विरोध कर रहे हैं, लेकिन राज्य सरकार का कहना है कि कार्रवाई केवल कानूनी रूप से चिन्हित अवैध विदेशियों के विरुद्ध ही की जा रही है।
देखा जाये तो असम की यह कार्रवाई केवल एक राज्य की सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर में तेजी से उभर रहे अवैध प्रवासन संकट की व्यापक तस्वीर का हिस्सा भी है। यूरोप इस समय ऐसे ही संकट से जूझ रहा है। स्पेन के उत्तर अफ्रीकी क्षेत्र स्यूटा (Ceuta) में हजारों प्रवासियों ने मोरक्को से सीमा पार कर घुसपैठ कर ली। इससे स्थानीय संसाधनों पर भारी दबाव पड़ा, सीमा सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े हुए और पूरे यूरोपीय संघ में अवैध प्रवासन को लेकर नई बहस शुरू हो गई।
इसी संदर्भ में अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्यूटा की घटनाओं को पश्चिमी देशों की ढीली सीमा नीतियों का परिणाम बताते हुए कहा कि अनियंत्रित प्रवासन राष्ट्रीय संप्रभुता और आंतरिक स्थिरता को कमजोर करता है। देखा जाये तो दुनिया के कई देशों में यह धारणा मजबूत हो रही है कि अवैध और बिना सत्यापन वाले बड़े पैमाने के प्रवासन से आवास, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर असाधारण दबाव पड़ता है। साथ ही सीमा पार अपराध, मानव तस्करी और सुरक्षा संबंधी जोखिम भी बढ़ जाते हैं।
इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए अनेक देश अब कड़े आव्रजन नियम लागू कर रहे हैं। सरकारों का तर्क है कि राष्ट्रीय संप्रभुता बनाए रखने, सीमाओं पर कानून का शासन स्थापित करने, मानव तस्करी के नेटवर्क को तोड़ने, स्थानीय संसाधनों की रक्षा करने और लोकतांत्रिक जनादेश के अनुरूप सीमा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त कदम आवश्यक हैं। तेज पहचान, त्वरित प्रत्यावर्तन और अवैध प्रवेश के विरुद्ध स्पष्ट कार्रवाई को कई देश अब अपनी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा बना रहे हैं।
भारत में भी बांग्लादेशी और रोहिंग्या समेत अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर केंद्र सरकार, सुरक्षा एजेंसियां और राज्य सरकारें अधिक सक्रिय हुई हैं। सरकार का कहना है कि कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए केवल उन लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की जा रही है जिनकी अवैध स्थिति विधिसम्मत रूप से स्थापित हो चुकी है। बहरहाल, ऐसे समय में जब दुनिया के अनेक देश अवैध प्रवासन से उत्पन्न आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, भारत का जोर भी वैध आव्रजन व्यवस्था, सीमा सुरक्षा और कानून के प्रभावी अनुपालन पर दिखाई दे रहा है। असम में चल रहा अभियान इसी व्यापक नीति का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।
