कल तक जिस पाकिस्तानी सेना की गीदड़भभकिया वह दिया करती थी आज उसकी हेकड़ी हवा हो चुकी है। वजह है अफगानिस्तान के तालिबान लड़ाके जो आए और वे पाकिस्तानी सेना को दौड़ा दौड़ा कर पीट रहे हैं। लेकिन इस तालिबानी मार का असर अब पाकिस्तान के मिसाइल डीपों पर दिखने लगा है। [जिन अफगान लुटेरों और आक्रांताओं को पाकिस्तान ने दशकों तक अपना नेशनल हीरो बताया। अपनी मिसाइलों का नाम जिनके नाम पर रखा आज तालिबान के डर से पाकिस्तान उन मिसाइलों के नाम बदलने पर मजबूर हो चुका है। जिस तालिबान को पाल-पोस कर पाकिस्तान ने बड़ा किया। आज वही तालिबान पाकिस्तानी सेना और मुनीर गैंग की ऐसी तैसी कर रहा है। आए दिन सीमा पर पाकिस्तानी सेना पिट रही है और इस मार का दर्द सीधे इस्लामाबाद के हुक्मरानों के दिल में बैठ गया है। तालिबान से मिल रही कूटनीति और सैन्य बल का नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान अब अपने इतिहास को ही बदलने की तैयारी में जुटी। भारत से नफरत और हिंदुओं को चिढ़ाने के चक्कर में पाकिस्तान ने दशकों से जिन अफगान और मध्य एशियाई लुटेरों, सुल्तानों और हमलावरों को अपना अब्बा जान बना रखा था अब उनसे तौबा की जा रही है। पाकिस्तान अब अपनी मिसाइलों जैसे गजनवी, गोरी, बाबर, अब्दाली के नाम बदलने पर विचार कर रहा है। वजह यह है कि कल तक जो पाकिस्तान के लिए इस्लामी हीरो थे, आज वह अचानक आक्रांता और डाकू नजर आने लगे हैं।
पाकिस्तान अपनी मिसाइलों और अन्य हथियारों के नाम कैसे रखता है?
विभिन्न देशों की तरह पाकिस्तान की भी अपने सैन्य हथियारों का नाम रखने की एक अनूठी परंपरा है, जो मुख्य रूप से इस्लामिक इतिहास और भारतीय उपमहाद्वीप पर आक्रमण करने वाले शासकों पर आधारित है। जहां भारत अपने हथियारों के नाम ‘अग्नि’ या ‘पृथ्वी’ जैसे संस्कृत और पौराणिक शब्दों पर रखता है, वहीं पाकिस्तान ने अपनी अधिकांश बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का नाम मध्य एशियाई, अफगान और तुर्क विजेताओं के नाम पर रखा है जिन्होंने अतीत में भारत पर हमले किए या यहाँ अपने साम्राज्य स्थापित किए। उदाहरण के लिए, उसकी मिसाइल श्रृंखला का मुख्य आधिकारिक नाम ‘हत्फ’ (Hatf) है, जिसका अरबी में अर्थ ‘निशाना’ होता है और यह पैगंबर मोहम्मद की तलवार/ढाल से जुड़ा है। इसके अलावा, हत्फ-III गजनवी का नाम महमूद गजनवी पर, हत्फ-V गौरी का नाम मोहम्मद गौरी पर, हत्फ-VII बाबर का नाम मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर पर और तैमूर क्रूज मिसाइल का नाम 14वीं शताब्दी के क्रूर आक्रामक तैमूरलंग के नाम पर रखा गया है। यह नामकरण नीति रणनीतिक रूप से सैन्य शक्ति और एक खास ऐतिहासिक पहचान को दर्शाने के लिए अपनाई गई है।
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पाकिस्तानी हथियारों के नाम अरबी शब्दों और इतिहास से प्रेरित हैं
हथियारों के नाम विजेताओं के नाम पर रखने के अलावा, पाकिस्तान अपने हथियारों के जखीरे को युद्ध और धर्म से जुड़े प्रतीकों से जोड़ने के लिए अरबी शब्दों और शुरुआती इस्लामी इतिहास का भी काफी इस्तेमाल करता है। पूरी ‘हत्फ’ मिसाइल सीरीज़ और ‘अंज़ा’ एयर-डिफेंस सिस्टम के नाम पैगंबर मुहम्मद से जुड़े हथियारों (जैसे भाला और छोटा भाला) के अरबी शब्दों पर रखे गए हैं, जबकि नेवल फ्रिगेट ‘ज़ुल्फ़िकार’ का नाम उनकी मशहूर तलवार के नाम पर रखा गया है। इसके अलावा, अल-खालिद और अल-ज़रार टैंक शुरुआती अरब सेनापतियों के सम्मान में रखे गए हैं, जबकि ‘रअद’ (गड़गड़ाहट) क्रूज़ मिसाइल का नाम कुरान की 13वीं सूरह से लिया गया है। यह वैचारिक सोच सिर्फ़ हथियारों के सिस्टम तक ही सीमित नहीं है। पाकिस्तान की सेना का मीडिया विंग, DG ISPR, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में उग्रवादियों को “भारत के प्रॉक्सी” (भारत के इशारे पर काम करने वाले) बताने के लिए अक्सर सातवीं सदी की इस्लामी धार्मिक शब्दावली का इस्तेमाल करता है, जैसे कि ‘फ़ितना-अल-खवारिज’ और ‘फ़ितना-अल-हिंदुस्तान’। इन्हीं ऐतिहासिक संदर्भों ने सैन्य अभियानों को भी आकार दिया है। उदाहरण के लिए, 1965 में कश्मीर में घुसपैठ के पाकिस्तानी अभियान का कोडनेम ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ रखा गया था, जो आठवीं सदी में स्पेन पर मुस्लिम विजय की याद दिलाता है; इसमें गज़नवी, बाबर और खालिद फ़ोर्स जैसी टुकड़ियाँ शामिल थीं। इस्लामी इतिहास, धार्मिक अवधारणाओं और विदेशी विजेताओं के नामों का लगातार इस्तेमाल करके, पाकिस्तान की सैन्य शब्दावली ने उन हिंदू, बौद्ध और सिख परंपराओं को काफी हद तक हाशिए पर धकेल दिया है, जिन्होंने उस ज़मीन को आकार दिया था जिस पर आज पाकिस्तान का कब्ज़ा है। जिस देश ने ऐतिहासिक रूप से अपनी पहचान उन लोगों से जोड़ी हो जिन्होंने इस इलाके को जीता था, वहाँ उनसे पहले के लोगों का सम्मान करने या उन्हें याद करने के लिए बहुत कम प्रोत्साहन रहा है।
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क्या पाकिस्तान अपने हथियारों के नाम बदलकर अपनी भारतीय जड़ों को फिर से अपनाएगा?
ऐसा लगता है कि पाकिस्तान अब उपमहाद्वीप की उस सांस्कृतिक विरासत को फिर से अपनाने की कोशिश कर रहा है जिसे उसने लंबे समय से नज़रअंदाज़ किया था। आठवीं सदी में मुहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध की जीत पर ही मुख्य रूप से केंद्रित ऐतिहासिक सोच से आगे बढ़कर, वह अब सिंधु घाटी सभ्यता को अपनी राष्ट्रीय पहचान का एक अभिन्न अंग दिखाने के लिए डॉक्यूमेंट्री, पर्यटन अभियानों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार का सहारा ले रहा है। फिर भी, सांस्कृतिक बदलाव में एक हैरान करने वाला विरोधाभास दिखता है। एक तरफ़ पाकिस्तान भारतीय सभ्यता वाली पहचान अपनाना चाहता है, तो दूसरी तरफ़ वह मध्यकालीन हमलावरों का सम्मान भी करता है, जिन्होंने इस इलाके पर हमले किए थे; उसने अपनी कुछ सबसे अहम मिसाइलों के नाम उन्हीं हमलावरों के नाम पर रखे हैं। दूसरे हथियारों के नाम अरबी इतिहास या शब्दावली से प्रेरित हैं। कुछ नाम तो पैगंबर मुहम्मद के हथियारों के नाम पर रखे गए हैं। इन सभी का संबंध इस्लामी संस्कृति से है, न कि भारतीय संस्कृति से।
आखिर अचानक पाकिस्तान को यह अक्ल क्यों आई?
इसके पीछे दो बड़ी वजह हैं। पहली तालिबान के हाथों मिल रही लगातार सैन्य शिकस्त और दूसरी भारत का वो कड़ा प्रहार जिसके तहत नई दिल्ली ने सिंधु जल संधि को सस्पेंड करने की चेतावनी दी है। जैसे ही भारत ने पानी रोकने का इशारा किया। प्यासे मरते पाकिस्तान और अचानक अपनी सिंधु विरासत पर गर्व होने लगा जो पाकिस्तान कल तक अरब और अफगान लिटोरों में अपनी पहचान ढूंढता था। वो आज अपनी ही जमीन के इतिहास पर वापस आने को मजबूर है। लेकिन पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि अगर वो आक्रांताओं के नाम हटा भी दे तो मिसाइलों के नए नाम रखेगा किस पर? क्योंकि अगर पाकिस्तान अपनी जमीन पर इतिहास खोदना शुरू करेगा तो उसे सिर्फ और सिर्फ हिंदू नाम ही मिलेंगे। बच्चों को लाहौर का इतिहास ढूंढेंगे तो भगवान राम के बेटे लौ का नाम सामने आएगा। अब भला दो राष्ट्र सिद्धांत की रट लगाने वाला और भारत से नफरत की बुनियाद पर टिका पाकिस्तान किसी हिंदू शख्सियत पर गर्व कैसे कर सकता है?
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच ये खूनी जंग क्यों छिड़ी है?
असल में दोनों देशों के बीच विवाद की सबसे बड़ी जड़ है ब्रिटिश दौर की डूरंड लाइन जिसे तालीबान सरकार सीमा मानने से साफ इंकार कर रही है। पिछले एक साल में दोनों देशों के बीच सीमा पर जमकर जंग चल रही है। डूरंड लाइन पर तारबंदी उखाड़ने से शुरू हुआ यह विवाद अब आमने-सामने की गोलीबारी में बदल चुका है। हालात यह है कि अपनी जमीन पर तहरीक तालीबान, पाकिस्तान के हमलों और सीमा पर तालीबानी फौज के कड़े प्रहारों ने जनरल आसिफ मुनीर की सेना को घुटनों पर ला दिया है। पाकिस्तान ने जिस तालीबान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए पाला था। आज उसी भस्मासुर ने मुनीर सेना का गुरूर मिट्टी में मिला दिया है। अपने इस्लाम पूर्व विरासत को नकार कर अरब और तुर्क बनने की चाहत रखने वाले पाकिस्तान की आज दुनिया भर में खिल्ली उड़ रही है।
