कर्नाटक में ‘एसोसिएटेड मैनेजमेंट ऑफ़ प्राइमरी एंड सेकेंडरी स्कूल्स’ (KAMS) के जनरल सेक्रेटरी शशि कुमार ने बेंगलुरु के एक डे-केयर सेंटर में हुई एक दुखद घटना के बाद राज्य के शिक्षा विभाग की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार हज़ारों बिना रजिस्ट्रेशन वाले सेंटरों के गैर-कानूनी कामकाज पर आंखें मूंदे हुए है। इस घटना पर बात करते हुए, कुमार ने बच्चों की सुरक्षा में हुई चूक के लिए रेगुलेटरी निगरानी की कमी को ज़िम्मेदार ठहराया।
उन्होंने कहा, “यह दुखद है, लेकिन इसका दोष शिक्षा विभाग पर ही जाता है क्योंकि शिक्षा अधिनियम के तहत 2018 का एक स्पष्ट कानून है, जिसके अनुसार हर प्री-प्राइमरी स्कूल का रजिस्ट्रेशन होना चाहिए। अगर वे रजिस्टर्ड नहीं हैं, तो वे जवाबदेह नहीं होते। इसी वजह से हमें ऐसी दुखद घटना देखने को मिलती है। यह निंदनीय है।
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कुमार ने आगे आरोप लगाया कि सरकार ने ऐसी जगहों पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर बार-बार दी गई चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया है। उन्होंने कहा सरकार को फ़ैसला लेना होगा। हमने पहले भी इन सेंटर्स को रेगुलेट करने के लिए कई शिकायतें की हैं क्योंकि यहाँ नशीली दवाएँ दी जाती हैं, बच्चों का गलत इस्तेमाल होता है, उन्हें शारीरिक सज़ा दी जाती है; JJ (जुवेनाइल जस्टिस) एक्ट और POCSO एक्ट का उल्लंघन होता है, लेकिन सरकार इन सेंटर्स की तरफ़ से आँखें मूँदे हुए है। जब उनसे पूछा गया कि क्या सरकारी लापरवाही की वजह से ये सेंटर बच्चों की सुरक्षा से ज़्यादा मुनाफ़े को अहमियत देते हैं, तो कुमार ने स्थानीय अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए। कुमार ने ANI को बताया, “बिल्कुल, क्योंकि सरकार और स्थानीय अधिकारी मिलीभगत में शामिल हैं। वे ‘हफ़्ता’ (रिश्वत) लेते हैं और बिना रजिस्ट्रेशन और बिना किसी जवाबदेही के इन्हें चलने देते हैं। यह गलत हो रहा है।
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KAMS के जनरल सेक्रेटरी ने इस समस्या के बड़े पैमाने पर होने की बात कही और दावा किया कि राज्य में हज़ारों प्री-प्राइमरी संस्थान अभी कानूनी दायरे से बाहर चल रहे हैं। कुमार ने कहा एसोसिएशन ने हमेशा शिकायत की है। उन्होंने शिकायत दर्ज कराई है, सैंपल दिए हैं, लेकिन सरकार कर्नाटक में भी कोई कार्रवाई करने में नाकाम रही है। और अभी हमें जानकारी मिली है कि 25,000 प्री-प्राइमरी स्कूल बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं। ऐसे में, वहां जो कुछ भी होता है, उसके लिए कौन ज़िम्मेदार होगा? हमने शिकायत की है, लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया है, और इसकी ज़िम्मेदारी विभाग की है – यानी शिक्षा विभाग और उच्च अधिकारियों की।
