पिछले 80 सालों से दुनिया का हर छोटा बड़ा व्यापार एक ही भाषा समझता है। डॉलर की भाषा। ऐसे में अगर आप भारत में बैठकर ब्राजील से कॉफी खरीदना चाहते हैं, तो आपको डॉलर चाहिए। अगर रूस से तेल चाहिए तो डॉलर चाहिए। लेकिन साल 2026 में यह नियम बदल रहे हैं। ग्रेटन वुड्स टू का वो ढांचा जिसे पश्चिमी देशों ने अपनी सुविधा के लिए बनाया हुआ था। दरअसल 1944 में जब दुनिया दूसरे विश्व युद्ध की आग में झुलस रही थी तब अमेरिका के न्यू हैमशायर में 44 देशों के प्रतिनिधि मिले। उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था बनाई जहां डॉलर को सोने यानी गोल्ड की गारंटी मिली। इसे कहा गया ब्रिटेन वुड सिस्टम। 1971 में रिचर्ड्स निक्न ने सोने की गारंटी तो हटा दी लेकिन डॉलर की बादशाहत बनी रही क्योंकि दुनिया का तेल यानी पेट्रो डॉलर सिर्फ डॉलर में बिकता था। लेकिन समस्या तब आई दोस्तों जब अमेरिका ने इस सिस्टम को एक फाइनेंशियल वेपनाइजेशन की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया और भारत का पक्का दोस्त रूस उसका सबसे बड़ा प्रमाण है। जब भी कोई देश अमेरिका की विदेश नीति से असहमत होता है तो अमेरिका उसे स्फ्ट यानी कि सोसाइटी ऑफ वर्ल्ड वाइड इंटर बैंक फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन से बाहर कर देता है। ईरान के साथ भी यही हुआ और साल 2022 में रूस के साथ भी यही हुआ। रूस के $300 बिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज कर देना दुनिया के लिए एक वेकअप कॉल था। भारत, चीन, ब्राजील जैसे देशों ने सोचा कि अगर आज रूस के साथ यह हो सकता है, तो कल हमारे साथ क्यों नहीं हो सकता है? यहीं से ब्रिटेन वुड्स टू के विकल्प की तलाश शुरू हो गई।
क्या ब्रिक्स अपनी साझा मुद्रा लाएगा?
आर्थिक एक्सपर्ट्स कहते हैं कि यह काफी कठिन है क्योंकि भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाएं अलग-अलग तरह से काम करती हैं। लेकिन समाधान एक करेंसी नहीं बल्कि एक यूनिट ऑफ अकाउंट हो सकता है। यानी एक ऐसा सिस्टम जहां हम आपस में व्यापार स्वर्ण यानी गोल्ड या अपनी मुद्राओं के एक बास्केट के आधार पर करें। अगर ऐसा हुआ तो ब्रिटेन वुड्स ताश की तरह से वह ढह जाएगा। अमेरिका अब दुनिया को डरा नहीं पाएगा क्योंकि व्यापार के विकल्प मौजूद होंगे दूसरे। भारत की इस डिजिटल युद्ध का सबसे चमकता हुआ सितारा है यूपीआई। भारत का यूपीआई यानी कि यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस आज सिर्फ एक पेमेंट ऐप नहीं बल्कि एक डिजिटल पब्लिक गुड बन चुका है। पहले हम वीजा और मास्टर कार्ड पर पूरी तरह से निर्भर थे। जिनका हर ट्रांजैक्शन डाटा अमेरिका तक जाता था। आज हमारे पास रुपए और यूपीआई है। जहां Swift के जरिए पैसा भेजने में 2 से 3 दिन लगते थे और भारी कमीशन करता था। यूपीआई इसे सेकंडों में लगभग मुफ्त कर देता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विज़न है कि जब एक भारतीय पर्यटक विदेश जाए तो उसे अपनी जेब में डॉलर रखने की जरूरत ना हो और उसका फोन ही काफी हो। यह ब्रिटेन वुड्स के वर्चस्व को सीधी चुनौती देता है क्योंकि भारत एक ऐसा न्यूट्रल और डेमोक्रेटिक विकल्प दे रहा है जिस पर दुनिया भरोसा कर सकती है और यूपीआई की सफलता की कहानी सिर्फ आंकड़ों में नहीं है बल्कि उन देशों के विश्वास में भी छिपी है जो अब भारत की तकनीक को अपना रहे हैं। जब हमने फ्रांस में यूपीआई को लॉन्च किया। पड़ोसियों के साथ आर्थिक रिश्तों को मजबूत करने के लिए भारत ने यूपीआई को एक राजनयिक उपहार के रूप में इस्तेमाल कर लिया और यह भी ब्रिटेन वुड्स के वर्चस्व को सीधी चुनौती देता है क्योंकि अमेरिका का प्रभुत्व उसके पेमेंट नेटवर्क यानी कि वीजा और मास्टर कार्ड से आता था। दुनिया को यह चुनना होगा कि वे किस श पर ज्यादा भरोसा करते हैं। इन दोनों का मेल ब्रिटेन वुड्स के लिए सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि यह देश अब अपनी ऊर्जा और संसाधनों का व्यापार डॉलर के बिना कर रहे हैं। खैर, दुनिया एक मल्टीपोलर यानी कि बहुध्रवी वित्तीय व्यवस्था की तरफ आगे बढ़ चुकी है।
भारत, रूस, चीन और ब्राजील मिलकर एक ऐसी छत बना रहे हैं जहां आर्थिक फैसलों पर किसी एक देश का वीटो नहीं होगा। अब क्या भारत इस नई व्यवस्था का नेतृत्व करेगा? भारत पहले ही अपनी डिजिटल शक्ति दुनिया को दिखा चुका है।