पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने जो ऐतिहासिक और रिकॉर्ड जीत दर्ज की है, उसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस ‘बंगाल फतह’ की पटकथा के पीछे राष्ट्रीय नेतृत्व के अलावा सबसे निर्णायक भूमिका किसने निभाई? वो है ‘राजस्थान की ब्रिगेड’। राजस्थान से गए बीजेपी के धुरंधर नेताओं ने दीदी के गढ़ में ऐसी अचूक रणनीतिक बिसात बिछाई, जिसने चुनावी नतीजों की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख दी। चुनाव अभियान प्रभारी भूपेन्द्र यादव और प्रदेश प्रभारी सुनील बंसल के कुशल नेतृत्व में राजस्थान के नेताओं ने बंगाल की जमीन पर उतरकर पार्टी के लिए जीत का नया रास्ता तैयार किया।
ममता बनर्जी अपने गढ़ में क्यों हार गईं?
भाजपा कार्यकर्ता ने खुलासा किया, “जब लोगों ने अपने क्षेत्रों में विकास नहीं देखा, तो उनकी राय बदलने लगी। प्रधानमंत्री मोदी पर विश्वास और चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका के कारण लोगों ने निडर होकर मतदान किया।” राठौर के अनुसार, सुवेंदु की ईमानदारी, स्पष्टवादिता और गरीबों के साथ खड़े रहने” की छवि ही मुख्यमंत्री की अपने गढ़ में हार का कारण बनी। ममता बनर्जी द्वारा “बूथ कैप्चरिंग और हिंसा” के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर, राजेंद्र राठौर ने यह कहकर उन्हें खारिज कर दिया कि “निराश व्यक्ति अंधाधुंध प्रतिक्रिया करता है।
माइक्रोमैनेजमेंट के माध्यम से भय का पर्दाफाश
राठौर ने कहा कि टीएमसी ने मतदाताओं को डराने के लिए अपने स्थानीय क्लबों में तैनात लोगों पर भरोसा किया। हालांकि, भाजपा ने प्रत्येक बूथ और ‘शक्ति केंद्र’ के लिए सूक्ष्म स्तर पर एक मजबूत ढांचा तैयार किया, जिससे विपक्ष के एकाधिकार और भय का पर्दाफाश हुआ, जिसके परिणामस्वरूप निर्णायक जीत मिली। जब उनसे पूछा गया कि क्या पश्चिम बंगाल को अपना अगला मुख्यमंत्री भाबानीपुर से मिलेगा, तो राठौर ने कहा कि राजनीति संभावनाओं का खेल है। उन्होंने आगे कहा कि नेतृत्व ही तय करेगा, लेकिन यह एक सशक्त नेता के करिश्मे को दर्शाता है।
भवानीपुर – पश्चिम बंगाल का एक महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्र
पिछले एक दशक में बंगाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि में इस निर्वाचन क्षेत्र की अहम भूमिका रही है। 2021 में, टीएमसी के वरिष्ठ नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने भाजपा के रुद्रनील घोष को 28,719 वोटों से हराकर यह सीट जीती थी। बाद में उन्होंने ममता बनर्जी को उपचुनाव लड़ने का मौका देने के लिए इस्तीफा दे दिया, क्योंकि उसी वर्ष नंदीग्राम सीट अधिकारी से हारने के बाद मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए ममता बनर्जी को उपचुनाव कराना जरूरी था। उपचुनाव में ममता बनर्जी ने भाजपा की प्रियंका तिबरेवाल को लगभग 60,000 वोटों के अंतर से हराकर निर्णायक जीत हासिल की। इस परिणाम ने भवानीपुर को टीएमसी के गढ़ के रूप में स्थापित किया, जिस स्थिति को पार्टी ने 2011 से काफी हद तक बरकरार रखा है।
भाबनीपुर में सत्ता-विरोधी लहर
मुख्यमंत्री के मतगणना केंद्र से बाहर निकलते ही भाबनीपुर में तनाव साफ महसूस हो रहा था। भाजपा समर्थकों की भीड़ ने “घोटालाबाज ममता दूर हटो” के नारे लगाते हुए उनका स्वागत किया, जो तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन के बाद सत्ता-विरोधी लहर का संकेत था। इससे पहले दिन में, टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने राज्य चुनावों में भाजपा की भारी जीत को “अनैतिक” करार दिया और आरोप लगाया कि 100 से अधिक सीटों पर जनादेश “लूटा” गया था। भाबनीपुर विधानसभा क्षेत्र में मतगणना केंद्र से बाहर निकलते हुए उन्होंने कहा कि हम वापसी करेंगे।
भवानीपुर में चक्रव्यूह: खुद ममता बनर्जी के निर्वाचन क्षेत्र भवानीपुर में पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ और उनकी टीम ने ऐसा मजबूत मोर्चा संभाला कि बीजेपी उम्मीदवार को अहम बढ़त मिली।
उत्तर बंगाल में सेंधमारी: केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और पूर्व केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी ने उत्तर बंगाल में आक्रामक और प्रभावी अभियान चलाकर पार्टी की स्थिति को अभेद्य बना दिया।
कोलकाता में खुला जीत का खाता: टीएमसी के सबसे मजबूत गढ़ कोलकाता उत्तर और दक्षिण में भी राजस्थान का जादू चला। कोलकाता उत्तर में विधायक अतुल भंसाली, शंकर सिंह राजपुरोहित और डॉ. शीला विश्नोई के कैंपेन से पार्टी ने 7 में से 4 सीटों पर पहली बार जीत दर्ज की।
दक्षिण का रण: वहीं कोलकाता दक्षिण में पूर्व प्रदेश महामंत्री मोतीलाल मीणा की कमान में बीजेपी ने आधा दर्जन सीटों पर जीत का ऐसा खाता खोला, जिसने सबको चौंका दिया।