राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष दोनों ने ही विचार-विमर्श के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए दायर महाभियोग प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। सदस्यों को सूचित किया गया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(5), अनुच्छेद 124(4), मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 11(2) और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत राज्यसभा के 63 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित 12 मार्च, 2026 का एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया था, जिसमें कुमार को पद से हटाने की मांग की गई थी।
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सभी प्रासंगिक पहलुओं और संबंधित मुद्दों का सावधानीपूर्वक और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करने के बाद, राज्यसभा के अध्यक्ष ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए प्रस्ताव की सूचना को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। लोकसभा सचिवालय ने कहा किभारत के संविधान (अनुच्छेद 324(5) व 124(4)) और मुख्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के तहत धारा 11(2) और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत लोकसभा के 130 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित दिनांक 12 मार्च, 2026 के एक प्रस्ताव संबंधी नोटिस लोकसभा अध्यक्ष को सौंपा गया था जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की गई थी।
सचिवालय ने कहा, प्रस्ताव के नोटिस पर उचित विचार-विमर्श करने और उसमें शामिल सभी प्रासंगिक पहलुओं और मुद्दों के सावधानीपूर्वक और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के बाद, लोकसभा अध्यक्ष ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 के तहत उन्हें प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, प्रस्ताव के उक्त नोटिस को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। राज्यसभा के सभापति राधाकृष्णन ने भी विपक्ष के नोटिस को खारिज कर दिया। राज्यसभा सचिवालय द्वारा जारी बुलेटिन में यह जानकारी दी गयी।
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इसमें कहा गया है कि प्रस्ताव की सूचना पर उचित विचार-विमर्श करने और सावधानीपूर्वक और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करने के बाद सभापति ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत उन्हें प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए उक्त नोटिस को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। अपने नोटिस में, लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 विपक्षी सदस्यों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त कुमार पर ‘‘कार्यपालिका के इशारे पर काम करने’’ का आरोप लगाया था। इसके अलावा, उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के माध्यम से लोगों को ‘‘बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने’’ का भी आरोप लगाया था।
