भारत की राजनीति एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है क्योंकि महिला आरक्षण को लागू करने की दिशा में केंद्र की मोदी सरकार जिस तेजी से कदम बढ़ा रही है, उसने पूरे देश में नई बहस छेड़ दी है और आधी आबादी के मन में नई उम्मीदें जगा दी हैं। हम आपको बता दें कि ताजा प्रस्ताव के अनुसार, लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 किया जा सकता है, ताकि एक तिहाई यानी लगभग 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकें।
अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो संसद की तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी। वर्तमान में जहां लोकसभा में 543 सदस्य हैं, वहीं नई व्यवस्था में यह संख्या बढ़कर 816 हो सकती है। इसका मतलब है कि लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित होंगी। इस बदलाव के साथ बहुमत का आंकड़ा भी बढ़कर 409 हो जाएगा। यानि सरकार बनाने का गणित ही नहीं, राजनीति की रणनीति भी पूरी तरह बदल जाएगी। यह कदम सिर्फ संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की लोकतांत्रिक संरचना को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में बड़ा प्रयास है।
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बताया जा रहा है कि मोदी सरकार इस बदलाव को लागू करने के लिए कम से कम दो अहम विधेयक लाने की तैयारी में है। पहला, परिसीमन से जुड़ा विधेयक और दूसरा, संविधान संशोधन। संविधान संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत जरूरी होगा। यही वजह है कि सरकार विपक्ष के साथ सहमति बनाने में जुटी हुई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा विपक्षी नेताओं के साथ लगातार बैठकों का दौर भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
इस पूरी कवायद का सबसे अहम लक्ष्य 2029 के आम चुनाव माने जा रहे हैं। सरकार चाहती है कि महिला आरक्षण उसी चुनाव से लागू हो जाए। इसके लिए परिसीमन की प्रक्रिया को तेज करने और जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करने की योजना बनाई जा रही है। कुछ प्रस्तावों में 2011 की जनगणना के आधार पर ही यह प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात भी सामने आई है। हर राज्य में सांसदों की संख्या बढ़ने से राजनीतिक समीकरण बदल जाएंगे। उदाहरण के तौर पर, कई राज्यों में मौजूदा सीटों की तुलना में बड़ी वृद्धि देखी जा सकती है। इससे क्षेत्रीय दलों की रणनीति और चुनावी समीकरण भी पूरी तरह बदल सकते हैं।
हालांकि यह रास्ता आसान नहीं है। संविधान संशोधन के लिए जरूरी बहुमत, विपक्ष की सहमति, परिसीमन की जटिल प्रक्रिया और राजनीतिक हितों का टकराव, ये सभी इस योजना के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। इसके अलावा, आरक्षण के भीतर आरक्षण यानी अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं के प्रतिनिधित्व का संतुलन भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है।
वैसे इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर यह योजना पूरी तरह लागू होती है, तो यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे बड़ा राजनीतिक सुधार साबित हो सकता है क्योंकि आज भी भारतीय संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है, जबकि देश की आबादी में उनका हिस्सा लगभग आधा है। ऐसे में 816 सीटों वाली संसद सिर्फ एक आंकड़ा नहीं होगी, बल्कि यह उस नए भारत का प्रतीक होगी जहां महिलाओं की आवाज सत्ता के केंद्र में होगी। अब नजर इस बात पर है कि मोदी सरकार इस महत्वाकांक्षी योजना को राजनीतिक सहमति के साथ जमीन पर उतार पाती है या नहीं? लेकिन इतना तय है कि महिला आरक्षण की यह पहल भारतीय राजनीति को नई दिशा देने वाली है और शायद आने वाले दशकों तक इसकी गूंज सुनाई देगी।
