हिंद महासागर की उफनती लहरों के बीच एक छोटा-सा द्वीप राष्ट्र अचानक वैश्विक ताकतों की आंखों में आंख डालकर खड़ा हो गया है। हम आपको बता दें कि श्रीलंका ने जो फैसला लिया है, उसने न केवल वाशिंगटन और तेहरान को चौंकाया है बल्कि पूरे इंडो पैसिफिक की रणनीतिक गणित को हिला कर रख दिया है। यह कोई साधारण कूटनीतिक कदम नहीं, बल्कि एक सख्त संदेश है कि अब छोटे देश भी दबाव में झुकने वाले नहीं हैं।
श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने संसद में खुलकर बताया है कि अमेरिका ने अपने दो युद्धक विमान मत्तला अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतारने की अनुमति मांगी थी। ये कोई साधारण विमान नहीं थे, बल्कि आठ जहाज रोधी मिसाइलों से लैस थे। तारीखें थीं चार और आठ मार्च। लेकिन कोलंबो ने साफ शब्दों में कह दिया, नहीं।
यही नहीं, उसी समय ईरान के युद्धपोत भी श्रीलंका के बंदरगाहों में प्रवेश की अनुमति मांग रहे थे। एक तरफ अमेरिका का दबाव, दूसरी तरफ ईरान का आग्रह। लेकिन श्रीलंका ने दोनों को ठुकराकर खुद को तटस्थ घोषित किया। राष्ट्रपति ने इसे निष्पक्षता बताया, लेकिन असल में यह एक साहसिक रणनीतिक दांव था।
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि और भी विस्फोटक है। हम आपको याद दिला दें कि चार मार्च को अमेरिकी पनडुब्बी ने गाले के पास ईरानी युद्धपोत आईरिस देना को निशाना बनाकर डुबो दिया था। इस हमले में दर्जनों नाविक मारे गए और कई घायल हुए। इससे पहले यही जहाज भारत के विशाखापत्तनम में एक बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेकर लौटा था। ऐसे में श्रीलंका का निर्णय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
हम आपको यह भी बता दें कि श्रीलंका पर आरोप लगे थे कि उसने ईरानी जहाज को समय पर बंदरगाह में प्रवेश नहीं दिया, जिससे वह हमले का शिकार हो गया। विपक्ष ने इसे अमानवीय करार दिया। लेकिन श्रीलंका के राष्ट्रपति ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि अगर अमेरिका और ईरान दोनों को ना कहा गया है, तो यह किसी एक के पक्ष में झुकाव नहीं बल्कि सख्त तटस्थता है।
रणनीतिक नजर से देखें तो यह फैसला कई परतों में असर डालता है। एक तो हिंद महासागर विश्व व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की जीवन रेखा है। यहां नियंत्रण का मतलब है वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पकड़। अमेरिका लंबे समय से इन समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखने के नाम पर अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। दूसरी ओर ईरान भी अपनी नौसैनिक ताकत के जरिए प्रभाव बढ़ाना चाहता है। ऐसे में श्रीलंका का अपने हवाई अड्डे और बंदरगाहों को इन ताकतों से दूर रखना एक तरह से अपने भूभाग को युद्ध का मैदान बनने से बचाने की रणनीति है। यह कदम भारत, मालदीव और पूरे दक्षिण एशिया के लिए भी संकेत है कि क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना अब पहले से ज्यादा कठिन होने वाला है।
इसके अलावा, अमेरिका के विशेष दूत सर्जियो गोर की श्रीलंका यात्रा भी इसी संदर्भ में बेहद अहम है। उनका एजेंडा साफ है समुद्री मार्गों की सुरक्षा, बंदरगाहों पर नियंत्रण और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना। लेकिन श्रीलंका ने यह दिखा दिया कि वह केवल आर्थिक सहयोग के नाम पर सैन्य दखल को स्वीकार नहीं करेगा।
दूसरी ओर अमेरिका का यह दबाव कि ईरानी जहाज के बचे हुए नाविकों को वापस नहीं भेजा जाए, कूटनीतिक तनाव को और बढ़ाता है। यानी श्रीलंका भी इस शक्ति संघर्ष का केंद्र बनता जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यह है कि वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। छोटे देश अब केवल मोहरे नहीं रह गए हैं। वह अपने हितों की रक्षा के लिए बड़े फैसले लेने को तैयार हैं, चाहे सामने अमेरिका जैसा महाशक्ति ही क्यों न हो।
श्रीलंका का यह रुख आने वाले समय में इंडो पैसिफिक की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। यह एक चेतावनी भी है कि अगर बड़ी ताकतें अपनी सीमाएं नहीं समझेंगी, तो क्षेत्रीय देश मिलकर उन्हें चुनौती देने से पीछे नहीं हटेंगे।
बहरहाल, हिंद महासागर अब केवल व्यापार का रास्ता नहीं रहा, बल्कि यह आने वाले वैश्विक संघर्षों का केंद्र बन चुका है। और इस उफनते समुद्र के बीच श्रीलंका ने जो लकीर खींची है, वह आने वाले समय की सबसे बड़ी कहानी बनने वाली है।