तेलंगाना के कई नगर निकायों में चुनाव परिणाम घोषित होने के एक सप्ताह बाद जो दृश्य सामने आ रहे हैं, वह लोकतंत्र के लिए असहज ही नहीं, शर्मनाक भी हैं। राजधानी हैदराबाद से लेकर मेडक मलकाजगिरी, खम्मम, सूर्यापेट, पेद्दापल्ली, भद्राद्रि कोठागुडेम, जगत्याल और निजामाबाद जैसे जिलों तक एक अजीबो गरीब पोस्ट पोल ड्रामा चल रहा है। बताया जा रहा है कि चुनाव हार चुके उम्मीदवार घर घर जाकर वह नकद रकम और उपहार वापस मांग रहे हैं, जो उन्होंने मतदान से पहले बांटे थे।
बताया जा रहा है कि 10 फरवरी को मतदान से ठीक पहले कुछ नगरपालिकाओं और वार्डों में प्रति वोट ढाई हजार से तीन हजार रुपये तक बांटे गए। महिला मतदाताओं को प्रेशर कुकर और साड़ियां दी गईं। यह सब खुलेआम हुआ। लेकिन परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आए तो अब वही उम्मीदवार या उनके परिजन मतदाताओं के दरवाजे खटखटा रहे हैं।
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सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो ने आग में घी का काम किया है। एक वीडियो में एक पुरुष और एक महिला, जिन्हें एक प्रमुख दल से जुड़ा बताया जा रहा है, साड़ियां वापस ले जाते दिख रहे हैं। पूछे जाने पर महिला कहती है कि अगर उन्हें एक वोट मिला तो विपक्ष को चार। दूसरे वीडियो में एक महिला, जिसे उम्मीदवार बताया जा रहा है, एक मतदाता पर दबाव बनाती दिखती है कि वह कसम खाकर बताए कि उसने वोट उसी को दिया। आश्वासन मिलने के बाद वह सूची में नाम के आगे निशान लगाती है।
मेडक मलकाजगिरी जिले में मतगणना के तुरंत बाद एक उम्मीदवार के घर घर जाकर रकम लौटाने की मांग करने की खबर है। येल्लमपेट नगरपालिका में एक निर्दलीय उम्मीदवार के पति ने कथित रूप से लोगों से कहा कि या तो पैसे लौटाओ या कसम खाकर बताओ कि वोट उनकी पत्नी को दिया था। कई जगहों पर कहासुनी और झड़प की भी सूचना है।
विडंबना यह है कि इतने वीडियो वायरल होने के बावजूद राज्य निर्वाचन आयोग ने कहा है कि उसे कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली और उसने वीडियो भी नहीं देखे। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र केवल शिकायत मिलने पर ही जागता है? क्या सार्वजनिक रूप से प्रसारित हो रहे सबूत भी पर्याप्त नहीं?
अब जरा इस घटनाक्रम पर ठहर कर विचार करें। वोट खरीदने की प्रवृत्ति नई नहीं है, पर हार के बाद रकम वापसी की मांग लोकतांत्रिक नैतिकता के ताबूत में नई कील है। यह मानसिकता बताती है कि कुछ उम्मीदवार चुनाव को जनसेवा का अवसर नहीं, बल्कि निवेश और मुनाफे के सौदे की तरह देखते हैं। पैसा लगाया, वोट नहीं मिला, तो वसूली करो। यह सोच राजनीति को बाजार में बदल देती है, जहां मतदाता ग्राहक नहीं, माल समझा जाता है।
दूसरी ओर, मतदाता भी पूरी तरह निर्दोष नहीं कहे जा सकते। जब नकद और उपहार स्वीकार करने की संस्कृति सामान्य हो जाती है, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है। जो लेन देन की शुरुआत करता है, वह हार के बाद हिसाब भी मांगेगा। यह एक दुष्चक्र है, जिसमें भरोसा, विचार और नीति पीछे छूट जाते हैं।
सबसे गंभीर प्रश्न संस्थाओं की निष्क्रियता का है। यदि वीडियो सच हैं तो स्वतः संज्ञान क्यों नहीं? और यदि झूठे हैं तो स्पष्ट खंडन क्यों नहीं? चुप्पी संदेह को जन्म देती है। चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि आचरण की परीक्षा भी है।
यह समय है कि राजनीतिक दल आत्ममंथन करें। टिकट बांटते समय केवल जीतने की क्षमता नहीं, नैतिक विश्वसनीयता भी देखी जाए। निर्वाचन तंत्र को भी सख्त संदेश देना होगा कि वोट खरीदना और हार के बाद वसूली करना दोनों अपराध हैं।
बहरहाल, लोकतंत्र की साख केवल जीतने वालों से नहीं, हारने वालों के व्यवहार से भी तय होती है। यदि पराजय को गरिमा से स्वीकार करने की संस्कृति विकसित नहीं हुई, तो चुनाव उत्सव नहीं, अविश्वास का कारण बन जाएंगे। तेलंगाना की यह घटना चेतावनी है कि लोकतंत्र को बाजार बनने से बचाना होगा, वरना मतदाता और उम्मीदवार दोनों ही अंततः नुकसान में रहेंगे।
