नयी दिल्ली, दो नवंबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को एक नवंबर से 31 जनवरी तक राजधानी में दिल्ली के बाहर पंजीकृत उन वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाने के प्रशासन के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जो बीएस-6 उत्सर्जन मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांब्रे और न्यायमूर्ति संजय शर्मा की पीठ ने इस स्तर पर कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार करते हुए फरीदाबाद के एक वकील की याचिका पर नोटिस जारी किया और मामले को संबंधित याचिका के साथ 27 नवंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया। याचिकाकर्ता गुरमुख दास कोहली की ओर से पेश अधिवक्ता अनुराग सक्सेना ने पर्यावरण एवं वन विभाग की 23 जून की अधिसूचना को चुनौती दी थी, जिसमें तीन महीने के लिए बीएस-6 मानक पर खरा नहीं उतरने वाले दिल्ली के बाहर पंजीकृत वाहनों के राजधानी में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया है।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि दिल्ली को व्यापक योजना की जरूरत है, न कि टुकड़ों में या जल्दबाजी में उठाए गए ऐसे कदम की, जिसमें एक कार और उसी तरह की दूसरी कार के बीच अंतर किया जाए। याचिका में कहा गया कि पूर्ण प्रतिबंध की अवधि के दौरान दिल्ली में पंजीकृत बीएस-6 मानक पर खरे नहीं उतरने वाले वाहनों को राजधानी में चलने की अनुमति है, जो ‘भेदभावपूर्ण व्यवहार’ है। इसमें कहा गया कि यह कदम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में रहने वाले नागरिकों, जिनमें वकील और वादी भी शामिल हैं, की आवाजाही प्रतिबंधित करता है, इसलिए इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।
याचिका के अनुसार, यह नीति अनुपातहीन है, क्योंकि प्रतिबंध किसी भी दिन के वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) के स्तर पर निर्भर नहीं करता है। यह प्रतिबंध ऐसे समय लगाया गया है, जब अधिसूचना में साल भर नियम लागू करने और पार्किंग शुल्क दोगुना करने जैसे कम प्रतिबंधात्मक उपायों का भी प्रावधान है। याचिका में कहा गया, ‘‘विवादित निर्देश के तहत एक नवंबर 2026 से 31 जनवरी 2027 तक हर दिन और हर घंटे, उस दिन के वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) के स्तर की परवाह किए बिना, याचिकाकर्ता को हरियाणा में विधिवत पंजीकृत अपना वाहन दिल्ली में चलाने से रोका जाएगा, जबकि दिल्ली में पंजीकृत इसी तरह के बीएस-4 वाहन पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा।’’
इसमें दलील दी गई, ‘‘वर्गीकरण पंजीकरण के स्थान पर आधारित है, न कि उत्सर्जन पर।
पंजीकरण प्राधिकरण बदलने से वाहन से निकलने वाला धुआं नहीं बदलता। इस अंतर का प्रदूषण नियंत्रण के उद्देश्य से कोई संबंध नहीं है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।’’
याचिका में यह भी दलील दी गई कि वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) की ओर से सितंबर में जारी संशोधित चरबद्ध प्रतिक्रिया कार्ययोजना (ग्रैप) में इस तरह के प्रतिबंध का प्रावधान नहीं है और यह फैसला किसी वैज्ञानिक आकलन पर आधारित नहीं है।
