क्या आतंकवाद और सीमा पार अपराधों पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सख्त तेवरों से बांग्लादेश असहज है? यह सवाल इसलिए उठा है क्योंकि नई दिल्ली में हुए बिम्सटेक देशों के गृह मंत्रियों के पहले सम्मेलन से बांग्लादेश के गृह मंत्री नदारद रहे। बिम्सटेक के गृह मंत्रियों के सम्मेलन में अमित शाह ने साफ कर दिया कि आतंकियों को पनाह देने, उनकी फंडिंग करने और सीमा पार अपराधों को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ एक्शन लेने का समय आ चुका है। साथ ही बंगाल की खाड़ी से लेकर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तक भारत ने आतंकवाद, तस्करी और सीमा पार अपराधों के खिलाफ मोर्चा मजबूत करने की पहल करते हुए साफ कर दिया कि अब सिर्फ बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। आतंकियों और अपराधियों के नेटवर्क तोड़ने के लिए खुफिया सूचनाएं साझा करनी होंगी, आतंकवाद की फंडिंग पर चोट करनी होगी और भगोड़ों को कानून के शिकंजे में लाने के लिए सदस्य देशों को मिलकर ठोस कार्रवाई करनी होगी।
आतंकवाद के खिलाफ शाह का संदेश: सहयोग अब जमीन पर दिखना चाहिए
अपने संबोधन में अमित शाह ने कहा कि भारत वैश्विक आतंकवाद, संगठित अपराध और मादक पदार्थों की अवैध तस्करी से निपटने के लिए बिम्सटेक कन्वेंशन के प्रभावी क्रियान्वयन और सदस्य देशों के बीच सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने आगाह किया कि आपराधिक नेटवर्क राष्ट्रीय सीमाओं से परे काम करते हैं और स्थानीय कमजोरियों का फायदा उठाते हैं। इन नेटवर्कों के तौर-तरीके तेजी से बदल रहे हैं, इसलिए क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को भी अधिक सक्रिय और समन्वित बनाना होगा।
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शाह ने आतंकवाद के प्रति भारत की शून्य-सहिष्णुता नीति दोहराते हुए यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई कि क्षेत्र में किसी आतंकवादी नेटवर्क को शरण, भर्ती, प्रशिक्षण, वित्तपोषण या पड़ोसी देशों के खिलाफ गतिविधियों के लिए जगह न मिले। उन्होंने नामित नोडल एजेंसियों के माध्यम से कार्रवाई योग्य खुफिया सूचनाएं साझा करने, आतंकवादी वित्तपोषण पर संयुक्त कार्रवाई और संगठित अपराध के विरुद्ध समन्वय पर भी जोर दिया।
गृह मंत्री अमित शाह का संदेश केवल आतंकवादियों तक सीमित नहीं था। उन्होंने कहा कि भगोड़े अपराधियों और आतंकवादियों को दुनिया के किसी भी हिस्से में छिपकर कानून से बचने नहीं दिया जाना चाहिए। इसके लिए प्रत्यर्पण, कानूनी सहायता और संबंधित संधियों तथा राष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप आपसी सहयोग मजबूत करना जरूरी है। वित्तीय निगरानी, सीमा प्रबंधन और पुलिस तथा सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
1.7 अरब आबादी, पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था: सुरक्षा का दांव बड़ा
हम आपको बता दें कि बिम्सटेक की सामरिक अहमियत उसके भौगोलिक विस्तार और आर्थिक क्षमता में छिपी है। भारत, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और श्रीलंका के साथ म्यांमार तथा थाईलैंड को जोड़ने वाला यह समूह दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच महत्वपूर्ण संपर्क सेतु है। इसके सदस्य देशों में लगभग 1.7 अरब लोग रहते हैं, जो दुनिया की करीब 22 प्रतिशत आबादी के बराबर हैं। समूह की संयुक्त अर्थव्यवस्था का आकार लगभग पांच ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर बताया गया है।
हम आपको यह भी बता दें कि इतने बड़े क्षेत्र में आतंकवाद, नशीले पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी, अवैध वित्तीय प्रवाह और साइबर अपराध केवल कानून-व्यवस्था की समस्याएं नहीं हैं। ये व्यापार, निवेश, समुद्री संपर्क, आपूर्ति शृंखलाओं और क्षेत्रीय स्थिरता को भी प्रभावित कर सकते हैं। बंगाल की खाड़ी भारत की समुद्री सुरक्षा, पूर्वोत्तर राज्यों की संपर्क व्यवस्था और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ आर्थिक संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। ऐसे में सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना भारत की व्यापक क्षेत्रीय रणनीति का हिस्सा है।
बांग्लादेश की गैरहाजिरी: कूटनीतिक संदेश या रणनीतिक चूक?
दूसरी ओर, बिम्सटेक देशों के गृह मंत्रियों के सम्मेलन का सबसे संवेदनशील पहलू बांग्लादेश के गृह मंत्री की गैरहाजिरी है। बांग्लादेश ने गृह मंत्रालय के वरिष्ठ सचिव मंजूर मोर्शेद चौधरी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल भेजा, लेकिन मंत्री स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई। यह फैसला ऐसे समय आया है जब अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन और उनके भारत में रहने के बाद दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं। ढाका उनकी वापसी और प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है, जबकि भारत ने कहा है कि अनुरोध की जांच लागू कानून और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार की जा रही है। बांग्लादेश के गृह मंत्री की गैरहाजिरी का कूटनीतिक स्तर पर बड़ा महत्व है। साथ ही जिस क्षेत्रीय मंच का उद्देश्य आतंकवाद, तस्करी और सीमा पार अपराधों से मिलकर लड़ना है, वहां एक प्रमुख सदस्य देश के गृह मंत्री का अनुपस्थित रहना राजनीतिक अविश्वास की तस्वीर भी सामने रखता है।
साथ ही यहां पर बांग्लादेश की रणनीतिक दुविधा भी दिखाई देती है। भारत और बांग्लादेश की सुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी है। दोनों देशों के बीच लंबी साझा सीमा, सीमा पार आवाजाही, व्यापारिक संपर्क और पूर्वोत्तर भारत तक पहुंचने वाले भौगोलिक मार्ग सुरक्षा सहयोग को अनिवार्य बनाते हैं। ऐसे में राजनीतिक मतभेदों के कारण उच्चस्तरीय संवाद कमजोर पड़ता है, तो उसका नुकसान केवल कूटनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं रहता। खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, भगोड़े अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई, तस्करी पर नियंत्रण और सीमा प्रबंधन में भी समन्वय प्रभावित हो सकता है। हालांकि, बांग्लादेश ने प्रतिनिधिमंडल भेजकर संस्थागत भागीदारी बनाए रखी है।
शाह के भाषण के रणनीतिक निहितार्थ: भारत की क्षेत्रीय नेतृत्वकारी भूमिका
उधर, अमित शाह के भाषण की असली अहमियत उनके शब्दों से आगे जाती है। आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाने, भर्ती, प्रशिक्षण और वित्तपोषण की सुविधा नहीं मिलने देने का आह्वान सदस्य देशों के लिए एक साझा सुरक्षा मानक स्थापित करने की कोशिश है। इसी तरह प्रत्यर्पण और कानूनी सहयोग पर जोर देकर भारत यह संकेत दे रहा है कि क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को केवल सम्मेलनों और संयुक्त घोषणाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
हम आपको याद दिला दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 अप्रैल 2025 को थाईलैंड में आयोजित छठे बिम्सटेक शिखर सम्मेलन में इस संगठन को समावेशी विकास और सुरक्षा का मॉडल बनाने की बात कही थी। शाह ने उसी दृष्टिकोण को व्यावहारिक व्यवस्था में बदलने पर जोर दिया। इसका मतलब है कि भारत क्षेत्रीय सहयोग को खुफिया सूचनाओं, कानून प्रवर्तन, वित्तीय निगरानी और सीमा सुरक्षा के स्तर पर मजबूत करना चाहता है।
देखा जाये तो भारत की रणनीति में बंगाल की खाड़ी का विशेष महत्व है। इस क्षेत्र में समुद्री संपर्क, व्यापारिक मार्ग और दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ाव भारत की आर्थिक तथा सामरिक प्राथमिकताओं से जुड़े हैं। यदि आतंकवाद, नशीले पदार्थों की तस्करी और अवैध वित्तीय नेटवर्क पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित होता है, तो इससे क्षेत्रीय स्थिरता और संपर्क परियोजनाओं को लाभ मिल सकता है। दूसरी ओर, सदस्य देशों के बीच अविश्वास बना रहता है, तो अपराधी नेटवर्क उसी कमजोरी का फायदा उठा सकते हैं, जिसकी ओर अमित शाह ने ध्यान दिलाया।
हम आपको यह भी बता दें कि अमित शाह ने भारत की नीति को शांति, सह-अस्तित्व और सभी देशों की संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान से भी जोड़ा। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से विवाद सुलझाने की प्रतिबद्धता दोहराई। यह संदेश क्षेत्रीय सहयोग को किसी देश के विरुद्ध गठबंधन के रूप में पेश करने के बजाय साझा सुरक्षा के ढांचे में रखने का प्रयास है।
बहरहाल, बिम्सटेक के गृह मंत्रियों के इस पहले सम्मेलन ने क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध कराया है। भारत के सामने चुनौती इस पहल को ठोस परिणामों में बदलने की है। ऐसी व्यवस्था, जिसमें आतंकवाद की फंडिंग पर कार्रवाई हो, खुफिया सूचनाएं समय पर साझा हों, भगोड़े अपराधियों को कानूनी प्रक्रिया के जरिए वापस लाया जा सके और सीमा पार नेटवर्क के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई संभव हो। अब बांग्लादेश के सामने भी उतनी ही व्यावहारिक चुनौती है। शेख हसीना के प्रत्यर्पण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन उन्हें व्यापक सुरक्षा सहयोग से पूरी तरह अलग रखना दोनों देशों के हित में होगा। यदि राजनीतिक खींचतान क्षेत्रीय तंत्र को कमजोर करती है, तो इसका लाभ उन नेटवर्कों को मिल सकता है जो सीमाओं और संस्थागत कमजोरियों का फायदा उठाते हैं।
