पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और संभावित बड़े युद्ध के बीच अब एक और सैन्य हलचल ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। इस बार मामला सीधे यूरोप और मध्य पूर्व के बीच स्थित एक बेहद रणनीतिक द्वीप से जुड़ा है साइपस। जी हां, तुर्की ने अचानक इस इलाके में अपनी सैन्य ताकत बढ़ाते हुए छह एप्सोलर फाइटर जेट और एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर दिए हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि यह तैनाती साइपरस के उस उत्तरी हिस्से में की गई है जिस पर तुर्की ने दशकों से कब्जा कर रखा है। दुनिया के लगभग सभी देश इस इलाके को साइपरस का हिस्सा मानते हैं। लेकिन तुर्की इसे अलग देश बताता है और वही अकेला देश है जो इसे मान्यता देता है। यही वजह है कि तुर्की की यह नई सैन्य तैनाती अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नई बहस और तनाव को जन्म दे रही है। तुर्की के रक्षा मंत्रालय ने घोषणा करते हुए कहा कि उत्तरी साइपस में छह एप्स 16 फाइटिंग फोल्कन लड़ाकू विमान और एयर डिफेंस सिस्टम तैनात किए गए हैं। अंकारा का दावा है कि यह कदम वहां रहने वाले तुर्क समुदाय की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए उठाया गया है। लेकिन एक्सपर्टों का मानना है कि इसके पीछे असली वजह पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते सैन्य हालात हैं।
दरअसल ईरान और इज़राइल अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने पूरे क्षेत्र को बेहद संवेदनशील बना दिया है। अगर यह संघर्ष और फैलता है, तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यूरोप और भूमध्य सागर के इलाकों तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि तुर्की अब पहले से ही अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत कर रहा है। तुर्की के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह तैनाती एक चरणबद्ध सुरक्षा योजना का हिस्सा है। सरकार का कहना है कि अगर क्षेत्रीय हालात और बिगड़ते हैं तो आगे और भी सैन्य कदम उठाए जा सकते हैं। लेकिन इस कदम का एक और पहलू भी है जो इसे और ज्यादा संवेदनशील बनाता है। साइपरस भारत के करीबी मित्र देशों में से एक माना जाता है। भारत और साइपस के बीच दशकों से मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक संबंध रहे हैं। यूरोपीय यूनियन का सदस्य होने के कारण साइपस का महत्व और भी बढ़ जाता है। साइपस का दक्षिण हिस्सा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के नियंत्रण में है और वही यूरोपीय यूनियन का हिस्सा है। वहीं उत्तरी साइपरस पर तुर्की का कब्जा है और वही इलाके में तुर्की की सेना तैनात है। अब उसी क्षेत्र में F16 लाख विमानों की तैनाती ने सुरक्षा एक्सपर्टों को चिंतित कर दिया है।
दरअसल साइपरस का भू राजनीतिक महत्व बेहद ज्यादा है। यह द्वीप यूरोप, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के बीच स्थित है और भूमध्य सागर में रणनीतिक रूप से बेहद अहम जगह है। अगर यहां किसी भी तरह का सैन्य संघर्ष शुरू होता है तो उसका असर पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है। इसी बीच पिछले सप्ताह एक और घटना ने स्थिति को और ज्यादा गंभीर बना दिया। साइपस में स्थित ब्रिटेन के सैन्य एयरबेस आरएफ अक्रुत्री के पास एक ईरानी ड्रोन गिरा था। सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि यह ड्रोन लेबनान के ईरान समर्थित संगठन हिजबुल्लाह की ओर से भेजा गया। इस घटना ने यूरोपीय देशों की चिंता बढ़ा दी। इसी वजह से अब कई यूरोपीय देश भी साइपस के आसपास अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ानी शुरू कर चुके हैं। लेकिन तुर्की इस कदम से नाराज है। अंकारा का कहना है कि यूरोपीय देशों की सैन्य तैनाती से साइपरस अनावश्यक रूप से बड़े संघर्ष में खिस सकता है। यानी एक तरफ यूरोपीय देश सुरक्षा बढ़ा रहे हैं और दूसरी तरफ तुर्की भी अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। और इससे पूरे इलाके में सैन्य गतिविधियां भी तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही हैं।
हालात तब और ज्यादा गंभीर हो गए जब पिछले सप्ताह नाटो की एयर डिफेंस सिस्टम ने तुर्की के हवाई क्षेत्र में घुसी एक बैलेस्टिक मिसाइल को मार गिराया। बताया जा रहा है कि यह मिसाइल ईरान की ओर से दागी गई थी। हालांकि इस घटना की पूरी पृष्ठी अभी तक नहीं हो पाई है। लेकिन इसके बाद तुर्की ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी। तुर्की ने साफ कहा कि उसके हवाई क्षेत्र की ओर अगर कोई और मिसाइल भेजी गई तो इसका जवाब कड़ा दिया जाएगा। इन घटनाओं ने यह संकेत दिए कि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव अब धीरे-धीरे दूसरे क्षेत्रों को भी प्रभावित करने लगे हैं। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर अब साइपरस और उसके आसपास बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर टिकी है क्योंकि अगर यहां हालात बिगड़ते हैं तो इसका असर केवल यूरोप या मध्यपूर्व तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक राजनीति और सुरक्षा संतुलन पर भी पड़ सकता है।