बदलते आर्थिक माहौल में अब कर्मचारी ‘जॉब हॉपिंग’ (नौकरी बदलना) के बजाय ‘जॉब हगिंग’ को अपना रहे हैं। लोग नई और बेहतर नौकरी तलाशने के बजाय अपनी मौजूदा नौकरी को ही मजबूती से पकड़े हुए हैं। इसकी बड़ी वजह ज्यादा सैलरी नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता है। भर्ती की सुस्त रफ्तार, बढ़ती महंगाई और छंटनी के डर ने लोगों का आत्मविश्वास कम किया है। इसके साथ ही एआई और ऑटोमेशन के बढ़ते असर ने भी रोजगार को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक कर्मचारी सतर्कता के कारण एक ही जगह टिके हुए हैं। उनके लिए जॉब सिक्योरिटी भावनात्मक सुरक्षा कवच की तरह बन गई है, जो आर्थिक झटके से बचाने में मदद करती है 75% कर्मचारियों ने 2027 तक नौकरी न बदलने की बात कही अमेरिकी रोजगार प्लेटफॉर्म मॉन्स्टर 2025 रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में 75% कर्मचारियों ने कहा कि वे कम से कम 2027 तक मौजूदा नौकरी में बने रहना चाहते हैं। इनमें 48% ने माना कि रुकने की वजह जॉब संतुष्टि नहीं, आर्थिक अनिश्चितता और बदलाव का डर है। उम्रदराज कर्मचारी नौकरी की सुरक्षा को देते हैं तरजीह सर्वे में 55% का माना कि उम्रदराज कर्मचारी नौकरी से ज्यादा मजबूती से जुड़े रहते हैं। सिर्फ 25% लोगों का मानना है कि युवा कर्मचारी भी इसी तरह व्यवहार कर रहे हैं। आर्थिक वजहों से 26% लोग नौकरी की गारंटी को सबसे ऊपर रखते हैं। 94% पेशेवर: एक ही रोल में टिके रहने से रुकेगी तरक्की
एक ही रोल में लंबे समय तक रहने से प्रोफेशनल ग्रोथ रुक सकती है। सर्वे में 94% लोगों ने माना कि लंबे समय तक एक जगह टिके रहने से बेहतर वेतन, और नए अनुभव छूट सकते हैं, जो आगे चलकर बर्नआउट की वजह बनता है। एक ही कंपनी में रहकर ग्रोथ कैसे करें विशेषज्ञों के मुताबिक एक जगह टिकने का मतलब ग्रोथ रोकना नहीं है। कर्मचारी नई जिम्मेदारियां लें, नए स्किल्स सीखें, दूसरे डिपार्टमेंट के साथ प्रोजेक्ट करें। इंडस्ट्री नेटवर्क मजबूत रखें, ताकि हालात बदलने पर मौके कम न पड़ें।
दफ्तरों में जॉब हगिंग का ट्रेंड:भविष्य हायरिंग धीमी, महंगाई-छंटनी का डर और एआई का असर; वेतन वृद्धि से ज्यादा जरूरी पक्की नौकरी
सिद्धभूमि के लेखक एक प्रमुख समाचार लेखक हैं, जिन्होंने समाज और राजनीति के महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहरी जानकारी और विश्लेषण प्रदान किया है। उनकी लेखनी न केवल तथ्यात्मक होती है, बल्कि समाज की जटिलताओं को समझने और उजागर करने की क्षमता रखती है। उनके लेखों में तात्कालिक घटनाओं के विस्तृत विश्लेषण और विचारशील दृष्टिकोण की झलक मिलती है, जो पाठकों को समाज के विभिन्न पहलुओं पर सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।
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सिद्धभूमि -
एक ऐसे समय में जब प्रिंट एवं मुद्रण अपनी प्रारंभिक अवस्था में था ,समाचार पत्र अपने संसाधनो के बूते निकाल पाना बेहद दुष्कर कार्य था ,लेकिन इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए स्वर्गीय श्री शयाम सुन्दर मिश्र “प्रान ” ने 12 मार्च 1978 को पडरौना (कुशीनगर ) उत्तर प्रदेश से सिद्ध भूमि हिंदी साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ किया | स्वर्गीय श्री शयाम सुन्दर मिश्र “प्रान ” सीमित साधनों व अभावों के बीच पत्रकारिता को मिशन के रूप में लेकर चलने वाले पत्रकार थे । उनका मानना था कि पत्रकारिता राष्ट्रीय लोक चेतना को उद्वीप्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है । इसके द्वारा ही जनपक्षीय सरोकारो को जिन्दा रखा जा सकता है । किसी भी संस्था के लिए चार दशक से अधिक का सफ़र कम नही है ,सिद्ध भूमि ने इस लम्बी यात्रा में जनपक्षीय सरोकारो को जिन्दा रखते हुए कर्मपथ पर अपने कदम बढ़ाएं हैं और भविष्य के लिए भी नयी आशाएं और उम्मीदें जगाई हैं । ऑनलाइन माध्यम की उपयोगिता को समझते हुए सिद्ध भूमि न्यूज़ पोर्टल की शुरुवात जुलाई 2013 में किया गया |
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